पुरुषों की सेक्स संबंधी भूमिकाऐं हमने अभी पुरुषों के सबसे बडे बोझ के बारे में तो बात ही नहीं की। पुरुषों की सबसे कठोर और नुकसानदायक भूमिकाऐं सेक्स से संबंध रखती हैं। दूसरे शब्दों में समाज पुरुषों का जो सबसे ज़्यादा उत्पीडन करती है वह सेक्स संबंधों के दायरे में है। एक शहरी परिवेश में समाज की पुरुषों से सेक्स संबंधी अपेक्षाऐं, संक्षेप में, निम्नलिखित हैं: (यह अपेक्षाऐं अलग-अलग समय में और अलग-अलग जगहों में अलग-अलग होती हैं। भारत में कुछ समय पहले तक जो सेक्स संबंधी भूमिकाऐं थीं वह कम कठोर थीं। अब जो पाश्चात्य भूमिकाऐं लादी जा रही हैं वह इनसे कहीं ज़्यादा कठोर व पुरुष विरोधी हैं) - एक पुरुष की सभी स्त्रियोँ में सेक्स की रुचि होनी चाहिये - एक पुरुष की स्त्रियोँ में सेक्स की रुचि हमेशा होनी चाहिये - एक पुरुष का बडा लिंग होना चाहिये। - एक पुरुष के लिंग में यौन साथी जब भी चाहे तनाव आना चाहिये, भरपूर तनाव आना चाहिये और देर तक तनाव आना चाहिये। - एक पुरुष को अपना वीर्यपात देर तक रोकना चाहिये - एक पुरुष को स्त्री को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिये। - एक पुरुष में बच्चा पैदा करने की क्षमता होनी चाहिये। - इन भूमिकाओं के तहत एक पुरुष के शरीर व यौन अंगों की सामाजिक रूप से कोई निहित यौनिक कीमत नहीं है। या कहें कि समाज पुरुषों के शरीर की निहित sexual कीमत को मान्यता नहीं देता। एक पुरुष कि यौनिक कीमत केवल उसके लिंग के मैथुन करने या भेदने की क्षमता में है। अतः किसी पुरुष का अपने शरीर या किसी अन्य पुरुष का उसके शरीर की निहित यौनिकता को मान्यता देना वर्जित है। फलस्वरूप उसके अंदर अपने शरीर या यौन अंगों को लेकर कोई शर्म नहीं होनी चाहिये। - पुरुष की गुदा को भेदना ना सिर्फ़् सामाजिक रूप से उसका यौन शोषण करना है वरन् ये उसकी मर्दानगी का सबसे बुरी तरह से ह्रास करना है। इस मे रुचि दिखाना निचले दर्जे की नामर्दी समझा जाता है। ये समाज द्वारा केवल त्रितीय लिंग के व्यक्तियों के लिये ही निर्धारित है। - और चूंकि पुरुष के शरीर की कोई निहित यौनिक कीमत नहीं है इसका हरण या शोषण भी सामाजिक दृष्टि से नामुमकिन है, खासतौर पर एक स्त्री द्वारा क्योंकि स्त्री पुरुष की गुदा को नहीं भेद सकती। क्योंकि पुरुष की सामाजिक यौन कीमत केवल उसके लिंग द्वारा किसी को भेदने में है और पुरुष को भेदने देना तो उसपर एहसान करना माना जाता है अतः सामाजिक दृष्टि से पुरुष का यौन शोषण स्त्रियों द्वारा एकदम नामुमकिन है। - एक पुरुष में दूसरे पुरुष या तृतीय लिंग व्यक्ति के साथ एक्टिव सेक्स करने की क्षमता भी होनी चाहिये। - इसको छोडकर एक पुरुष में दूसरे पुरुष के प्रति कोई भी सेक्स की भावना नहीं होनी चाहिये। जब कोई पुरुष दूसरे पुरुष के प्रति यौन रुचि का इज़हार करे तो ये उसके शरीर की यौन कीमत को मान्यता देना है और समाज की नज़र में ये उसका अपमान है। ऐसे में समाज दूसरे पुरुष से आशा करता है कि वो पहले पुरुष से सख्ती से पेश आये। बल्कि उससे यह भी उम्मीद की जाती है कि वह पहले पुरुष से मारपीट कर के या उसे (खासतौर पर सामाजिक रूप से) जलील कर के अपने 'अपमान' का बदला ले। - एक पुरुष दूसरे पुरुष से प्रेम नहीं कर सकता। यह सभी भूमिकाऐं जरूरी नहीं कि शब्दों में लोगों को बताई जाती हों। फिर भी हम जानते हैं कि यह मौजूद हैं। यह कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक भूमिकाओं की तरह सेक्स संबंधी भूमिकाऐं भी कुदरत द्वारा नहीं बल्कि समाज द्वारा बनाई गई हैं। और इनका उíेश्य है पुरुषों के यौन व्यवहार को नियंत्रित करना। इनमें से कई प्राचीन काल में शुरू की गयी थीं। तब समाज के पास इन भूमिकाओं को बनाने का जो भी मकसद रहा हो, यह जरूरी नहीं कि वे मकसद आज भी सही हों। यहां पर यह कहना जरूरी है कि जहां तक यौन भावनाओं का सवाल है, अधिकतर पुरुषों की यौन जरूरतें स्त्री व पुरुष दोनों की हैं। हालांकि, दोनाें का समय और महत्व अलग-अलग है। पुरुषों के बोझ पुरुषों की सामाजिक व सेक्स संबंधी भूमिकाऐं ऐसे बोझ हैं जो उन पर अनेक प्रकार के दबाव डाल कर उनके जीवन को नियंत्रित करती हैं और उनका उत्पीडन करती हैं। इन बोझों के नीचे पुरुष सारी उम्र पिसता रहता है। खासतौर पर सेक्स संबंधी भूमिकाऐं ऐसे जबरदस्त बोझ बन जाती हैं जिनके असर से पुरुष अपने प्राकृतिक स्वभाव के विपरीत सोचने और व्यवहार करने के लिये मजबूर हो जाता है। ये भूमिकाऐं पुरुषों की जंजीरें हैं जो उनसे उनकी प्राकृतिक आजा.दी को छीन लेती हैं। इनकी वजह से पुरुष अपनी जिंदगी पूर्ण रूप से नहीं जी पाते। ये उस सामाजिक तंत्रिका के भाग हैं जिनके जरिये समाज पुरुषों के जीवन के छोटे से छोटे व्यवहार को नियंत्रित करता है। इन भूमिकाओं की इतनी ताकत है। आदमियों के सब से महत्वपूर्ण दबाव या बोझ निम्नलिखित हैं: - स्त्रियोँ के प्रति यौन आर्कषण को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने का बोझ - सेक्स की पौवर का बोझ - पुरुषों के प्रति यौन आर्कषण को दबाने का बोझ - भावनाओं को दबाने का बोझ - ताकतवर नजर आने का बोझ - क्रूर और स्वार्थी नजर आने को बोझ इनमें से सबसे नुकसानदायक और जबरदस्त दबाव पहले तीन बोझों -- यानी सेक्स संबंधी बोझ हैं। आइये देखते हैं कि ये पुरुषों को कैसे नुकसान पहुँचाते हैं। सेक्स संबंधी भूमिकाओं के नुकसान सेक्स संबंधी भूमिकाओं के मुख्य नुकसान निम्नलिखित हैं: 1 - स्त्रियोँ के प्रति यौन आर्कषण को बढ़ा-चढ़ा कर दिखानाः ''जब आदमी ना कहना चाहते हैं तो वह कहते हैं 'हां'।'' पुरुष ने सेक्स को एक स्वाभाविक क्रिया के रूप में लेने की शक्ति खो दी है। सेक्स उसके लिये सामाजिक मर्दानगी हासिल करने का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बना दिया गया है। और वह किसिके साथ, कब और कैसे सेक्स या प्रेम कर सकता है यह सब कडाई से सुनिश्चित कर दिया गया है। स्त्रियोँ के प्रति यौन आकर्षण को अपने स्वाभाविक रूप से कहीं ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के कई भीषण परिणाम होते हैं -- पुरुषों के लिये, स्त्रियोँ के लिये व सारे समाज के लिये। इस बोझ के जरिये समाज यह सुनिश्चित करता है कि अधिकतर पुरुष प्रजनन क्रिया में भाग लें। हालांकि, आज के युग में हमें अब और ज़्यादा बच्चों की कतई जरूरत नहीं है। पर स्वाभाविक यौन इच्छा से यूं खिलवाड करने से कई तरह की व्यक्तिगत और सामाजिक बुराईयां भी पैदा होती हैं। उदाहरण के लिये कुछ पुरुष, जो चाहे प्राकृतिक रूप से निचले दर्जे के पुरुष हों, जब उन्हें केवल स्त्रियोँ से यौन संबंध स्थापित करने से इतनी सामाजिक मर्दानगी मिलती है तो वे आपे से बाहर हो जाते हैं। वे औरतों से बलात्कार करते हैं, उनका यौन शोषण करते हैं और स्त्रियोँ व दूसरे पुरुषों से दुव्र्यवहार करते हैं। एक सामान्य पुरुष को भी स्त्रियोँ के प्रति यौन भावनाऐं दर्शाने से सामाजिक मर्दानगी और ताकत का एहसास होता है। इसीलिये सामान्य पुरुष भी लड़कियों को छेडने जैसी क्रियाओं में भाग लेते हैं जो कि जाहिर है कि स्त्रियोँ को पसंद नहीं आता। अतः जहां इस बोझ की वजह से एक ओर तो स्त्रियोँ को पुरुषों के ऊपर असीम ताकत व नियंत्र ण हासिल होता है -- क्योंकि स्त्री यां ही पुरुषों की सामाजिक मर्दानगी का श्रोत हैं -- वहीं दूसरी ओर इससे वे पुरुषों के द्वारा परेशान की जाती हैं और पुरुष उन्हें इंसान नहीं बल्कि सामाजिक ताकत का जरिया समझते हैं। पर अधिकतर पुरुष, चाहे वह लड़की छेडते हों या कई लड़कियों से यौन संबंध बनाते हों, ऐसा इसीलिये करते हैं उनके ऊपर अपनी मर्दानगी साबित करने का बेहिसाब बोझ है। उनका अंर्तमन क्या चाहता है या क्या नहीं चाहता यह उनके लिये बेमाने हो जाता है। बहुत से पुरुष सेक्स में आनंद लेना ही छोड देते हैं और उसे केवल ताकत पाने के लिये करते हैं। पुरुष सिर्फ़ सेक्स से मिलने वाला आनंद ही नहीं खोते पर वे भीषण तनाव से भी ग्रस्त रहते हैं। इसके अलावा, सेक्स को ताकत के जरिये के रूप में देखने के कारण वे स्त्रियोँ से असली आत्मीयता भी नहीं बना पाते। वे स्त्रियों को सेक्स करने की वस्तु या ताकत के श्रोत के रूप में ही देखते हैं। 2 - पुरुषों के प्रति यौन भावना को दबाने का बोझ पुरुषों के अंदर दूसरे पुरुष की जो यौन जरूरत है उसे दबाने के अपने ही दुष्परिणाम हैं। इन भावनाओं की जड़ें मनुष्यों के उन शुरुआत के दिनों में हैं जब वे जंगलों में रहते व शिकार करते थे। पुरुषों के बीच घनिष्ठ यौन संबंध उन्हें एक दूसरे के साथ मिलकर रहने, साथ-साथ शिकार करने और एक दूसरे की देख-रेख करने में काफी मदद करते थे, जब कि स्त्रियोँ से पुरुषों का मेलजोल केवल साल में एक बार प्रजनन के लिये मिलन तक ही सीमित रहता था। एक दूसरे से प्रेम में बंधने की तीव्र भावना के बगैर वे आपस में प्रतियोगिता ही करते रहते और उनका आपस में साथ रहना और एक दूसरे को भावनात्मक सहारा देना नामुमकिन था। काफी समय बाद, जब समाज ने 'विवाह' की रीति बनाई तो उसने पुरुषों पर एक दूसरे से यौन रूप से जुडने पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी -- और धीरे-धीरे यह वर्जित हो गया। पर यह जरूरत और यह भावनाऐं अभी भी हैं। अधिकतर पुरुष इन भावनाओं को दबा लेने में कामयाब हो जाते हैं, चाहे वेे उनको समय-समय पर परेशान करती हों या उन्हें अंदर से तनावग्रस्त कर देती हों। पर कुछ पुरुष, खासतौर पर अगर वे बचपन में पुरुष कामुकता के प्रति खुल चुके हों, उनके लिये इस अनुभव को भुलाना बहुत मुश्किल हो सकता है। वे समाज के कठोर नियंमों की अनदेखी कर दूसरे पुरुष के प्रति इन भावनाओं को विकसित कर सकते हैं। ऐसे समाज जहां पुरुष और स्त्री ज़्यादातर अलग-अलग रहते हैं, और पुरुष दूसरे पुरुषों के साथ अपना काफी समय बिताते हैं, इन भावनाओं को पूरे तरीके से दबा पाना नामुमकिन है। ऐसे परिवेश में जहां पुरुष साथ-साथ सोते हों नहाते हों, वहां उनके बीच यौन संबंध उपजना आम बात है। इन समाजों की मर्दानगी की भूमिकाऐं भी ऐसे संबंधों को इज़ाज़त दे देती हैं जब तक कि उनको ज़्यादा तवज़्जो ना दी जाये और वे एक पर्दे में रह कर ही बनाए जाऐं। लड़के ऐसे में यह बहाना भी बना सकते हैं कि वहां लड़कियाँ मौजूद नहीं हैं। पर वे अपने आप को दूसरे के साथ प्रेम बंधन में बंधने की इज़ाज़त बिल्कुल नहीं देते। पर कभी-कभी सारी सावधानियों के पश्चात भी पुरुष दूसरे पुरुष से एक भावनात्मक बंधन में बंध जाता है। तब उनके अंदर एक द्वंद शुरू होता है और वे पूरी कोशिश करते हैं इस बंधन को तोडने की। यह बहुत ही पीडाजनक हो सकता है। अपनी भावनाओं को क्रूरता से दबाने की वजह से आदमी में भावनात्मकता एकदम खत्म हो सकती है और वे 'प्यार' करने की ताकत भी खो सकते हैं। केस स्टडी मनोज 18 वर्ष का एक स्मार्ट लड़का है। पिछले साल उसकी अपने पडोस में आये एक युवक से -- जो कि एक किरायेदार था -- दोस्ती हो गयी थी। मनोज को दीपक बहुत अच्छा लगता था। वे अक्सर एक दूसरे के घर आने जाने लगे। एक रोज़ अपने कमरे में बैठे-बैठे दीपक ने मनोज का हाथ अपने हाथ में ले लिया और वे वैसे ही घंटों बैठे रहे। मनोज को एक ओर तो उसका हाथ पकडना बहुत अच्छा लग रहा था पर दूसरी ओर उसे लग रहा था कि यह गलत है। अब मनोज दीपक के घर रोज आने लगा और वे रोज ऐसे ही हाथ में हाथ रखे, बिना कुछ कहे घंटों बैठे रहते थे। मनोज ना चाहते हुये भी दीपक से जुडता जा रहा था। ऐसा तीन महीने तक चला। एक दिन किसी बात पर दोनों में अनबन हो गयी और मनोज ने उसके घर जाना छोड दिया। एक महीने बाद मनोज को अपने लैटर-बौक्स्स में दीपक का पत्र मिला जिसमें लिखा था कि दीपक उससे प्यार करता है और उसके बिना नहीं रह सकता। उसमें यह भी लिखा था कि दीपक मानता था कि मनोज भी उससे प्यार करता है। एक ओर तो मनोज को यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि दीपक उससे प्यार करता है पर दूसरी ओर अपने बारे में ऐसा कहा जाने पर उसे बहुत गुस्सा आया। समाज में दूसरे पुरुष को प्यार करने वाले को 'होमो' कहा जाता था और वह अपने आप को 'होमो' कतई नहीं मानता था। वह खुले रूप से ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता था। वह दीपक के घर गया और उसने वह चिठ्ठी उसके सामने फाड दी। उसने गुस्से में कहा कि अगर उसके घर वालों के हाथ वह चिठ्ठी लग जाती तो क्या होता। उसने यह भी कहा कि उसमें दूसरे लड़कों की तरफ ऐसी कोई भावना नहीं है। ऐसा कहकर वह घर आया और कमरा बंद कर के शाम तक रोता रहा। अगले एक हफ्ते तक उसकी तबियत खराब रही और भूख प्यास भी खत्म हो गयी। उसी हफ्ते दीपक भी बिना कुछ कहे वह मोहल्ला छोड कर चला गया। |
अक्सर जब पुरुष किसी दूसरे पुरुष से भावनात्मक रूप से नज़दीक आने लगते हैं तो वे अपनी भावनाओं से एकदम विपरीत व्यवहार करने लगते हैं। वे उस पुरुष से कडाई से या बेरुखी से पेश आते हैं, और उसके साथ अकेले समय बिताने से कतराते हैं। वे ऐसा दर्शाते हैं कि उनके दिल में उस व्यक्ति के लिये कोई स्थान नहीं है। जाहिर है कि कोई भी संबंध इस तरह का गैर मत्रितापूर्ण व्यवहार नहीं झेल सकता। जब पुरुष उस पुरुष से, जिससे वे प्यार करने लगते हैं, अपना संबंध तोड लेते हैं तो वे राहत महसूस करते हैं। जैसे कोई बडा खतरा टल गया हो। यह और बात है कि इस बंधन के टूटने से उनके अंदर एक ऐसा खालीपन आ जाता है जो जीवनभर दूर नहीं होता। इन भावनाओं को दबाने का एक और नुकसान है। जब समाज लोगों को किसी स्वाभाविक और महत्वपूर्ण गुण को दबाने के लिये मजबूर करता है तो उसका सकारात्मक रूप तो खत्म हो जाता है पर अब वह बहुत ही नकारात्मक और नुकसानदायक रूप में बाहर निकलती है। इसी तरह, हालांकि पुरुष सबके बीच ऐसी भावनाओं का मजाक उडाते हैं पर जहां भी उन्हें युवा पुरुषों पर ताकत और नियंत्र ण हासिल होता है वे उनका चरम तरीकों से यौन शोषण करते हैं। फिर चाहे वह कालेज में रैगिंग के रूप में हो या फिर जेलों में कैदियों का यौन शोषण हो -- जैसा कि ईराक में हुआ। ऐसे समाज में जहां लड़के-लड़कियां एक साथ उठते-बैठते हैं, यह दबाव और T.यादा तीव्र हो जाता है। और चाहे-अनचाहे लड़कों को अपना सारा यौनाचार लड़कियों की ओर ही प्रवाहित करना पडता है। पर यह संबंध उनके लिये हमेशा सही नहीं ठहरते। और फिर भी ऐसे कुछ पुरुष बच जाते हैं जो कि अभी भी दूसरे पुरुषों से जुडना चाहते हैं। इस स्थिति में ऐसे लोगों पर 'होमो' या 'गे' का पêा लगा दिया जाता है। इससे यह दबाव बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। गौरतलब है कि भारत जैसे परंपरागत समाजों में 'होमो' शब्द केवल जनाने लड़कों के लिये ही प्रयोग किया जाता है। पाश्चात्य समाज पुरुषों के बीच यौन इच्छा को 'जनानी' प्रवर्तीि के रूप में प्रचार करता है और इससे लड़कों के ऊपर इन भावनाओं को दबाने का बोझ कई गुना और बढ़ जाता है। फिर इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर पुरुष जो खुल कर यह संबंध बनाते हैं वे जनाने ही होते हैं, क्योंकि जनाने पुरुषों का तो वैसे ही मजाक उडाया जाता है। और वैसे भी वे अपने आपको पूर्ण रूप् से पुरुष नहीं मानते और मर्द कहलाने की इच्छा भी नहीं रखते। पर दुख की बात तो यह है कि अगर कोई मर्दाना लड़का ऐसी भावनाऐं खुल कर दर्शाता है तो उसे भी 'होमो' का लेबल लगा दिया जाता है और उसकी मर्दानगी पर सवालिया निशान लग जाता है। अधिकतर मर्दाने लड़के अपनी इन भावनाओं को छिपा लेते हैं और अपनी यौन उर्ज़ा लड़कियों पर ही केंदि्रत कर देते हैं। कुछ लड़के एक खास स्थिति से भी गुजरते हैं जहां अपनी इन भावनाओं से भागने के चक्कार में लड़के एक के बाद एक कई लड़कियों के साथ सेक्स संबंध बनाते हैं। 3 - सेक्स समस्याऐं पुरुषों के यौन जीवन से खिलवाड की वजह से उनमें कई तरह की यौन समस्याऐं पैदा हो जाती हैं। यह ऐसी समस्याऐं हैं जो कि बीमारियाँ समझी जाती हैं पर असल में यह केवल पद सेक्स संबंधी सामाजिक बोझों की वजह से हैं। पर पुरुष इनकी चिंताओं से िघरे रहते हैं, क्योंकि यह माना चाहता है कि इनकी वजह से वे स्त्रियोँ को संतुष्ट नहीं कर पाते, अतः 'नामर्द 'बन जाते हैं। इन समस्याओं में शीघ्र पतन, लिंग में तनाव संबंधी समस्याऐं, लिंग का आकार, टेढ़ापन आदि जैसी कई समस्याऐं हैं। भारत में कई अनैतिक सेक्स क्लीनिक धडल्ले से चलते हैं जो कि पुरुषों का इलाज करने के नाम पर उनसे ढेरों पैसा लूटते हैं। आजकल कई डिग्री प्राप्त डौक्टर भी ऐसी समस्याओं को बीमारी बता कर ठीक करने का दावा करते हैं, पर वे सब कुछ ज़्यादा नैतिक नहीं हैं। वे पुरुषों पर मंहगे टेस्ट करते हैं और उन्हें झूठमूठ के रोग बताकर उन्हें मंहगी दवाइयाँ देते हैं -- जबकि उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं होता जिनका दवाइयों द्वारा इलाज हो पाये। इन दवाइयों का असल में कोई प्रभाव नहीं पडता। पुरुष को शुरू-शुरू में इनसे राहत मिलती भी है तो वह केवल मानसिक कारणों से है क्योंकि ये समस्याऐं सामाजिक व मानसिक हैं। कई बार इन दवाइयों का दुष्प्रभाव भी हो सकता है। 4 - पुरुषों का यौन शोषण मर्दानगी के उस सामाजिक भूमिका के चलते जिसमें आदमी को स्त्री का यौन रूप से गुलाम बना दिया गया है, पुरुष कई तरह के यौन शोषण का शिकार बनते हैं। पर उनका शोषण बहुत अजीब किस्म का होता है, जहां वे शोषण से संबंधित अधिकतर मानसिक क्षतिओं से गुजरते हैं पर उनका शोषण शोषण के रूप में देखा ही नहीं जाता। वे अक्सर खुद ही चुपचाप ऐसे शोषण के लिये राजी हो जाते हैं और वे इसके खिलाफ अपनी मर्दानगी को चोट पहुँचाये बिना शिकायत भी नहीं कर सकते। जब किसी पुरुष के पास कोई स्त्री सेक्स की इच्छा से जाती है तो वह अपनी मर्दानगी को चोट पहुँचाऐ बिना 'ना' नहीं कर सकता। स्त्रियोँ को पुरुषों को मर्द या नामर्द ठहराने की जो अदृश्य पर असल ताकत दी गई है उससे पुरुष का अपने ही शोषण के लिये चुपचाप हामी भर लेना सुनिश्चित हो जाता है ताकि वह छक्का कहलाये जाने से बच पाये। समाज में पुरुष की जिस तरह की छवि बनाई गई है उससे कोई मानने को तैयार ही नहीं होता कि इससे पुरुष को कोई हानि होती है। केस स्टडी रवि 21 वर्ष का है और हैंडसम है। वह दिल्ली के एक औफिस में काम करता है। उसके साथ एक समस्या है कि अक्सर जब वह सेक्स करता है तो उसके लिंग में तनाव नहीं आ पाता। जब उसे इस समस्या पर परामर्श दिया गया तो उसने बताया कि वह अक्सर लड़कियों के साथ सेक्स करता है पर इसमें हमेशा उसकी मर्जी नहीं होती। अक्सर जिन लड़कियों के साथ वह सेक्स करता है वह उनके पास भी नहीं जाना चाहता। उसने बताया कि वह उन लड़कियों से इसीलिये सेक्स करता है क्योंकि वे स्वयंही उसके पास आती हैं और वह 'छक्का' कहलाये जाने के डर से उनसे सेक्स करने को राजी हो जाता है। अब उसने इसको अपनी बदकिस्मती समझ कर स्वीकार कर लिया है। दूसरे लड़कों की तरह उसने भी सेक्स को शुरू-शुरू में ताकत के रूप में प्रयोग किया था। |
केस स्टडी शैलेंद्र 10वीं कक्षा का विद्यार्थी है। वह अपने ही मुहल्ले की एक 'दीदी' के यहां ट्यूशन पढ़ने जाता था। एक बार ट्यूशन पढ़ाते वख्त वह अजीब सा व्यवहार करने लगी -- जिसका मतलब साफ था कि वह उसे सेक्स के लिये उकसा रही थी। शैलेंद्र चाहते हुये भी ना नहीं कर पाया, खासतौर पर उस किशोरावस्था की उम्र में जब उसके ऊपर झूठी मर्दानगी के दबाव सबसे ज़्यादा तीव्र थे। उससे सेक्स के बाद वह अपने ही मन में घृणा से भर गया। अब उसने ट्यूशन में जाना छोड दिया और बाद में दूसरी ट्यूशन की क्लास ज्वाइन कर ली। |
समाज रवि और शैलेंद्र के दुख को शोषण नहीं मानेगा। पर अगर यही सब कुछ किसी लड़की के साथ हुआ होता तो यह बहुत बडा तूल पकड लेता। पहले के भारतीय समाज में, हालांकि स्त्रियों के पास तब भी यह अदृश्य ताकत थी, पर तब स्त्रियोँ के ऊपर भी पाबंदियाँ थीं और एक स्त्री को किसी पुरुष पर सेक्स के लिये यों अदृश्य दबाव डालने के लिये अपनी सामाजिक सीमा का उल्लंघन करना पडता था। पहले सेक्स की पहल अधिकतर पुरुष ही करते थे और इसीलिये भी स्त्रियोँ की इस ताकत पर अंकुश था। पर आज का समाज स्त्रियोँ को यौन रूप से अग्रसर होने के लिये बढ़ावा देता है। वहीं पुरुष पर उसे संतुष्ट करने का दबाव बढ़ì |