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Thursday 28 August, 2008
 20:38 | 9/Dec/2007 |  0 Comment(s)
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2 मर्दानगी -- पुरुष प्रकृति

 

पुरुषों के शोषण के हथियार

पुरुषों को उनके सामाजिक व यौन भूमिकाओं में बांधने के लिये समाज एक ऐसा तरीका अपनाता है जहां एक ओर तो इनके आगे सिर झुकाने के लिये उसे तरह-तरह के प्रलोभन और इनाम दिये जाते हैं, वहीं इनकी अव्हेलना करने पर उन्हें सजा दी जाती है। समस्या यह है कि यह इनाम अति के हद तक पहुच सकते हैं। खासतौर पर अगर सेक्स संबंधी सामाजिक भूमिकाओं को पूरा किया जाये तो। तब वे आपको इतना उंचा उठा देंगे कि आप को गिरने से डर लगने लगेगा। वे आपको इतनी सामाजिक ताकत और इज़्जत देंगे कि आपका दिमाग घूमने लगेगा। वहीं ये सजाऐं भी अति की हद तक हो सकती हैं -- अगर सेक्स संबंधी भूमिकाओं की खिलाफत की जाये तो। तब वे आप से सारी ताकत छीन लेंगे और आको इतना नीचे गिरा देंगे जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। वे आपकी सारी इज़्जत सारा रुतबा छीन लेंगे। तब आप अपने आप को 'आदमी' कहने का अधिकार भी खो दोगे। अगर आप यह देखें कि हमारे समाज ने हिजड़ों के साथ क्या किया है और पाश्चात्य समाज जनाने पुरुषों के साथ कैसा व्यवहार करता है तो आप को यह बात समझ में आ जायेगी। इन लोगों ने पुरुषें की निर्धारित की गयीं कुछ मुख्य सामाजिक भूमिकाओं को तोडने का जुर्म किया था।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि पुरुष इन सब से इतना भयभीत रहते हैं कि अपनी सामाजिक भूमिकाओं की खिलाफत नहीं करते।

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समाज द्वारा दिये गये इनाम

समाज उन पुरुषों को ढेरों इनाम देता है जो कि उसके द्वारा तय किये गये मर्दानगी की भूमिकाओं को अपना लेते हैं -- खासतौर पर सेक्स संबधी भूमिकाओं को। वह उन्हें अनगिनत सामाजिक ताकत, रुतबा वह सम्मान दिलाती है और उनकी मर्दानगी को स्वीकार करती है।

समाज ऐसे पुरुषों को एक उंचा स्थान देता है और इससे जो एक ताकत का एहसास होता है वह बहुत नशीला होता है। पुरुष इस नशे के आसानी से आदी हो जाते हैं। और इसके जरिये वे हमेशा के लिये इन भूमिकाओं के गुलाम बन जाते हैं।

आप जिस अनोखी ताकत और मर्दानगी का एहसास करते हैं जब आप गर्लफ़्रेंड बनाते हैं तो यह यही छिपा हुआ इनाम काम कर रहा होता है, कुदरत नहीं।

और जब कुछ लड़के दूसरों के ऊपर हावी हो जाते हैं क्योंकि उनके पास सामाजिक मर्दानगी द्वारा अपेक्षित कार्यों को करने से खासी ताकत आ जाती है, और वे दूसरों को नीचा दिखाने लगते हैं, तो वे इसी अदृश्य ताकत का इस्तेमाल कर रहे होते हैं जो कि समाज ने उन्हें अपने लक्ष्य को बढ़ाने के लिये दी है।

केस स्टडी

अमित और ललित दोनों 11वीं कक्षा में हैं और एक बस में सफ़र कर रहे हैं। अमित ललित से कहीं ज़्यादा ताकतवर और मर्दाना है। पर ललित अमित पर हावी हो जाता है क्योंकि वह हमेशा ही लड़कियों की बातें करता है।

बस एक सह-शिक्षा वाले स्कूल के सामने से गुजरती है और ललित कहता है, ''क्यों ना हम 11वीं के बाद इस स्कूल में भर्ती हो जायें?'' ''क्या मस्ती होगी इतनी सारी लड़कियों के साथ!''

अमित को यह विचार जरा भी पसंद नहीं आता। पर वह ऐसा कह नहीं सकता। वैसे ही ललित हमेशा उसपर हावी रहता है। ललित हावी इसीलिये रह पाता है क्योंकि समाज ऐसी बातें करने के लिय पुरुषों को सामाजिक ताकत देता है क्योंकि ये बातें पुरुषों की सामाजिक भूमिकाओं के अनुरूप हैं। वह ललित को हावी होने का और मौका नहीं देना चाहता। इसीलिये वह बस चुप रहता है। पर इसकी वजह से वह अपने आप को कमजोर महसूस करता है और शर्मिंदा भी कि वह ललित से राजी नहीं है। ललित इस बात को भांप लेता है और इससे उसकी ताकत और भी बढ़ जाती है।

जब लड़के दूसरे लड़कों पर साथियों का दबाव डालते हैं तो वे जबरदस्त ताकत का अनुभव करते हैं। साथियों के दबाव की जड़ ही यही है। सभी उन लड़कों को तंग करने के लिये चुनते हैं जिन्हें वे सामाजिक मर्दानगी की दौड में अपने से पीछे पाते हैं।

ये इनाम पुरुषों के लिये बहुत जरूरी हैं - ना सिर्फ़ इसलिये कि इससे उनको एक बेहतर जीवन का मौका मिलता है पर ज़्यादा इसलिये कि पुरुषों के संसार में रहने के लिये ये बहुत ही आवश्यक हैं। इसके बिना वे पुरुष के रूप में सम्मान के साथ नहीं रह सकते।

समाज पहले तो पुरुषों के अंदर अहम् की भावना को एक अति तक विकसित कर देता है। इससे पुरुष अपने इस अहम् को पूरा करने के लिये समाज द्वारा दिये गये इन इनामों पर निर्भर हो जाते हैं। पुरुष अपने अहम पर चोट खाने से बहुत डरते हैं और यह उनकी कमजोरी बन जाती है। इसीलिये वे झूठ और गप्प का सहारा लेते हैं और रूखा व्यवहार करते हैं।

बहुत ही आसानी से प्राप्त होने वाले इस सामाजिक ताकत की वजह से पुरुष अपना आपा खो बैठते हैं। लेकिन समाज द्वारा दी गई यह सारी की सारी ताकत केवल ऊपरी है, एक दिखावा है। यह पुरुषों को जीवन के असली उतार-चढ़ाव से निपटने के लिये बिल्कुल काम नहीं आती। जो पुरुष इस ताकत के आदी हो जाते हैं वे अपनी असली मर्दानगी को नहीं विकसित कर पाते। अतः वे अंदर से खोखले ही रह जाते हैं।

समाज जो मर्दानगी देता है वह नकली है। इससे पुरुषों को बिना कुछ किये ही खासा रुतबा और सम्मान मिल जाता है।

इन सबके बावजूद, पुरुष सामाजिक मर्दानगी के दबाव में किसी इनाम के लालच में नहीं आते। बल्कि इन भूमिकाओं को तोडने के जो भीषण सामाजिक परिणाम होते हैं उनके चलते पुरुषों के पास और कोई चारा नहीं रह जाता।

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समाज द्वारा दिये गये दंड

जब आप किसी मर्दानगी की भूमिका को अनदेखा करते हैं तो आप को नीचा दिखाया जाता है। लोग आप के व्यवहार को अजीब और पुरुषों के विपरीत करार देते हैं। आप का मजाक भी उडाया जा सकता है।

पर जब आप इन भूमिकाओं को तोडने की जुरर्रत करते हैं, खासतौर पर सेक्स संबंधी भूमिकाओं को तो यह सजा बहुत ही प्रचंड हो जाती है।

बेशक हिजड़े कई सदियों से समाज द्वारा दी गई सबसे बुरी सजा झेल रहे हैं। उनका जुर्म केवल इतना ही है कि लिंग के साथ पैदा होते हुये भी वे स्त्रियोँ की भांति रहना चाहते हैं।

केस स्टडी

जब कोई हिजड़ा मरता है तो हिजड़े एक बहुत ही अजीब और दुख भरी रस्म अदा करते हैं। वे उसकी लाश को चप्पलों से मारते हैं और कोसते हैं।

उनका मानना है कि इससे उस हिजड़े पर लगी बद दुआ समाप्त होगी और वह दूसरे जन्म में फिर से कभी हिजड़ा नहीं बनेगा।  यह दिखाता है कि हमारे समाज ने हिजड़ों को सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाओं को तोडने के लिये किस हद तक प्रतािडत किया है।

आम 'सामान्य' कहलाने वाले पुरुषों के लिये ये सजाऐं इतनी भयंकर तो नहीं होतीं, पर फिर भी बहुत बुरी हो सकती हैं। उन्हें सारा जीवन एक निचले दर्जे के पुरुष की भांति रहना पड सकता है -- एक 'नार्मद' कहलाते हुये। उदाहरण के लिये जो पुरुष बिना कोई ठोस वजह दिये प्रजनन क्रिया से दूर रहता है उसे समाज एक 'नामर्द' की नजर से देखती है।

ये सजाऐं कितनी संगीन होंगी ये तोडी गई समाजिक मर्दानगी की भूमिका पर निर्भर करता है। ये सिर्फ़ सामाजिक उपहास का पात्र  बनना भी हो सकती है या फिर समाज से बहिष्कृत करना या फिर मार पीट या गाली-गलौज का शिकार होना भी हो सकता है।

जो पुरुष किसी महत्वपूर्ण सेक्स संबंधी भूमिका को तोडते हैं ये सजाऐं अति की हद तक जा सकती हैं। उसको उसके उंचे स्थान से -- जहां उसे पहले रखा गया था, उठा कर जिल्लत और अकेलेपन की गहराइयों में फेंक दिया जाता है। वह अपनी सारी इज़्जत, सारा सम्मान और सारा रुतबा खो बैठता है। उसको 'नामर्द' कह कर मजाक उडाया जाता है। समाज उससे पुरुष कहलाने का हक भी छीन सकता है। इससे पुरुष एकदम टूट सकता है।

इस ईनाम और सजा वाले सामाजिक उत्पीडन से लड़ने का पुरुषों के पास बस एक ही उपाय है -- कि वे एकजुट हो जायें और समाज को बदल दें।

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नीचा दिखाना -- एक कारगर सामाजिक हथियार

नीचा दिखाना एक ऐसा हथियार है जो पुरुषों के खिलाफ अक्सर प्रयोग किया जाता है। और इससे पुरुष आसानी से 'सीधे' भी हो जाते हैं। जैसे ही आप सामाजिक मर्दानगी की सीमा को थोडा भी लांघते हैं तो कोई आकर एक तीखी प्रतिक्रिया आप को दे देगा। ऐसे नीचा दिखाये जाने से पुरुषों पर बहुत गहरा प्रभाव पडता है। यह नीचा दिखाना साथियों के दबाव का भी एक खास हथियार है।

पुरुषों को नीचा दिखाने के लिये प्रयोग करे जाने वाले सबसे ज़्यादा प्रचिलित शब्द इस प्रकार से हैं:

लड़की, औरत, नामर्द, छक्का, होमो, हिजड़ा, गांडू, गंडवा, हलवा, इत्यादि।

यही वह शब्द हैं जो पुरुषों को सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाते हैं। खासतौर पर एक मिश्रित को जिसने अभी यह दुनिया नहीं देखी है -- वह तो ऐसे शब्दों से टूट ही सकता है।

अगर हम लड़कों को सशक्त् करना चाहते हैं  तो हमें पहले उन्हें इन शब्दों के सही मायने समझाना होगा ताकि वे खुद देख पायें कि यह शब्द एकदम खोखले हैं और इनसे डरना बेफिजूल है। ये तभी तक कारगर होते हैं जब तक हम इनसे डरते हैं।

अगर हम अपने अहम् पर विजय पा पायें तो ये शब्द हमारा और कुछ नहीं बगिाड पायेंगे।

आइये देखें कि इन शब्दों में ऐसा क्या है कि पुरुष इनसे इतना डरते हैं।

यह सभी शब्द पुरुषों की मर्दानगी को चुनौती देते हैं और सामाजिक मर्दानगी की दौड में उन्हें पीछे खडा कर देते हैं। वे उनके तथा-कथित सेक्स की ताकत को चुनौती देते हैं। वे या तो पुरुषों की तुलना स्त्रियोँ से करते हैं या फिर उन जनाना लड़कों से जो कि पुरुषों से स्त्रियोँ के रूप में मैथुन करवाना चाहते हैं।

आइये इन शब्दों का विश्लेषण करते हैं और देखते हैं कि वे हमें किस प्रकार चोट पहुँचाते हैं:

1 - लड़की:

लड़की या औरत जैसे शब्द अक्सर जनाने लड़कों के लिये प्रयोग किये जाते हैं। हमारे समाज में लड़कों के अंदर स्त्रीलिंग की भावना बहुत बुरी समझी जाती है। जनाने लड़कों को अपने स्त्रीतत्व के साथ यों रहना पडता है जैसे कि यह उनकी कोई अपंगता हो। पर जनाने लड़के अपनी इस सामाजिक अपंगता की भरपाई सामाजिक मर्दानगी की सेक्स संबंधी भूमिकाओं पर खरे उतर कर कर सकते हैं। पर उनका लड़कियों का सा व्यवहार उन्हें सारी उम्र उपहास का पात्र  बना सकता है।

ये 'लड़की' आदि शब्द आम तौर पर उन सामान्य या मर्दाने लड़कों के लिये भी तब प्रयोग किये जाते हैं जब वे मर्दानगी की कोई भी भूमिका तोडते हैं -- कोई छोटी सी भी। अक्सर दादा किस्म के लड़के बिना वजह भी अपने से कमजोर लड़कों को जिन्हें वे नीचा दिखाना चाहते हैं 'लड़की' आदि कह कर चिढ़ा सकते हैं। यह शब्द इसलिये बुरा लगता है क्योंकि वह एक लड़के को ऐसा महसूस कराते हैं जैसे उसमें पौरुष की कमी हो। वे उसे यह भी एहसास करा सकते हैं कि वह उसे चिढ़ाने वाले से कमजोर है। और अपनी मर्यादा और सम्मान की रक्षा करने में सक्षम नहीं है। यह पुरुष के लिये बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति होती है। वह तब तक चैन नहीं पाता जब तक कि वह अपना खोया सम्मान अपनी चतुर बातों के बल पर, अपने आत्मविश्वास के बल पर या फिर लड़ कर वापिस ना हासिल कर ले।

अगर वह यह नहीं कर सकता तो फिर उसके अंदर एक गहरी हीन भावना घर कर लेगी जिससे बाहर आना बहुत मुश्किल होगा।

यह लड़की शब्द लड़कों को किसी काम को करने या ना करने के लिये उकसाने के लिये भी होता है। इसे उसके घर वाले, दोस्त आदि कोई भी प्रयोग कर सकते हैं।

केस स्टडी

दूसरी क्लास के कुछ लड़कों ने सुशील के सामने उसकी बहन के लिये कुछ गलत िटप्पणी दी। सुशील को बहुत ही बुरा लगा पर एक तो वह अकेला था दूसरा वह कमजोर भी था इसीलिये लड़ नहीं सकता था। इसीलिये वह चुपचाप यह बेइजत्ती बर्दाश्त कर के अपनी क्लास में आ गया।

जब दूसरे लड़कों को इसका पता लगा तो उन्होंने उसकी खूब निंदा की  और उसे 'लड़की' कह कर चिढ़ाया क्योंकि उसने उस लड़के को जिसने यह िटप्पिणयाँ दी थीं, थप्पड नहीं मारा।

अब अपना सम्मान बचाने के लिये सुशील कुछ करने पर मजबूर हो गया। वह कमजोर है फिर भी उन लड़कों से भिडने जाता है। उसने उस लड़के के पास जाकर उसे जोर से लात मारी और फिर तेजी से दौड पडा। वह लड़का सकते में आ गया क्योंकि उसने सुशील से इस तरह लड़ने की उम्मीद नहीं की थी। सुशील को बहुत ही आश्चर्य हुआ जब उस लड़के ने फिर सुशील से उलझना छोड दिया और बाकी लड़कों ने उसकी तारीफ की।

इस केस में सुशील ने अपना सम्मान अपनी हिम्मत दिखा कर वापिस ले लिया। पर लड़ना-झगडना हर स्थिति में संभव नहीं होता और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

यह देखते हुये कि सुशील ताकतवर नहीं है, इससे बेहतर तरीका यह होता कि सुशील जाकर अपने टीचर से बात करता। पर साथियों की दबाव के चलते और अपने सम्मान को बचाने के लिये सुशील को इतना जोखिम भरा कदम उठाना पडा।

यहां समझने वाली बात यह है कि किसी के कहने से कोई लड़का लड़की नहीं बन जाता। वैसे ही जैसे कि किसी के कहने से कोई लड़की लड़का नहीं बन जाती।

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2 - नामर्द:

नामर्द शब्द लड़की या औरत शब्द से कहीं ज़्यादा चोट पहुँचाने वाला है। नामर्द शब्द तब प्रयोग किया जाता है जब लड़का या आदमी अपने मुख्य यौन भूमिका को तोडता है।

नामर्द शब्द उस स्थिति में प्रयोग किया जाता है जब यह समझा जाता है कि वह पुरुष सेक्स करने या अपने यौन साथी को संतुष्ट करने में असफल है। यह माना जाता है कि ऐसे पुरुष में कोई शारीरिक कमी है। यह आमतौर पर निम्नलिखित स्थितियों के लिये प्रयोग किया जाता है:

  • लिंग का छोटा आकार

  • लिंग में तनाव कम आना या नहीं आना

  • शीघ्र पतन

  • बच्चा पैदा ना कर पाना

 

लिंग का छोटा आकार: यह समझा जाता है कि स्त्री को संतुष्ट करने के लिये पुरुष का लिंग बडा होना चाहिये। पर यह सिर्फ़ एक भ्रम है क्योंकि स्त्री अपनी योनि में पुरुष के लिंग को केवल 2 या 3 इंच तक ही महसूस कर सकती है। ज़्यादा बडा लिंग होने से स्त्री को संभोग में परेशानी हो सकती है।

मजे की बात तो यह है कि जनाने लड़कों व तृतीय लिंग के कई व्यक्तियों का लिंग खासा बडा होता है। पर वे जनाना व्यवहार करते हैं और मर्द नहीं कहलाये जाते।

अतः छोटा लिंग होने से कोई नामर्द नहीं बन सकता।

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लिंग में तनाव से संबंधित समस्या: अगर पुरुष के लिंग में तनाव कम आता है या कम देर के लिये आता है या फिर आता ही नहीं तो उस व्यक्ति को नामर्द करार कर दिया जाता है। अधिकतर नामर्द शब्द इसी स्थिति के लिये प्रयोग होता है।

पर अधिकतर लिंग में तनाव ना आ पाने के केस शरीर में या लिंग में किसी शारीरिक कमी की वजह से नहीं होते। लिंग में कोई खराबी केवल 1 या 2 प्रतशित केसों में ही होती है। अधिकतर किसी मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक वजहों से होते हैं जिनकी जड़ हमारे यही सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाऐं हैं।

केस स्टडी

आदिल की शादी 21 वर्ष के उम्र में ही हो गयी है। उसे लड़की बहुत पसंद थी। पर पहली रात संभोग से पहले ही उसके दोस्तों ने उसे बहुत डरा दिया और कहा कि अगर वह ढ़ंग से सेक्स नहीं कर पाया तो वह लड़की उसे 'छक्का' समझेगी और उसके और उसके हाथों से निकल जायेगी।

इस डर की वजह से आदिल इतना तनावग्रस्त हो गया कि संभोग के समय उसके लिंग में तनाव ही नहीं आया। इससे उसकी चिंता और बढ़ गयी और अब वह जब भी अपनी पत्नि के पास जाता तो उसके लिंग में तनाव आ ही नहीं पाता। अब उसके लिये इस चक्र से बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो गया है और वह अपनी बीबी के पास जाने से भी डरता है।

अधिकतर पुरुषों के जीवन में ऐसे पल आते हैं जब उनके लिंग में ढंग से तनाव नहीं आ पाता। यह अक्सर तब होता है जब वे तनाव, व्यस्तता या बीमारी आदि से गुजर रहे होते हैं।

लिंग में तनाव आने के लिये जरूरी है कि पुरुष का उस समय सेक्स करने का मन हो व उस यौन साथी से सेकस करने का मन हो। अगर उसे किसी ऐसी स्त्री से संभोग करना पडे जो उसे यौन रूप से अच्छी नहीं लगती तो उसके लिंग में स्वाभाविक तनाव आना मुश्किल है।  इसका अर्थ यह कतई नहीं हुआ कि उस व्यक्ति में कोई शारीरिक कमी है या वह नामर्द है। वह पुरुष जिस स्त्री या पुरुष को पसंद करता है उसके साथ उसके लिंग में आसानी से तनाव आ सकता है। उसी तरह एक पुरुष हो सकता है स्त्रियों को यौन साथी के रूप में देखता ही ना हो, पर अपने पसंद के पुरुष साथी के साथ उसके लिंग में पूर्ण तनाव आ सकता है। इनमें से कोई भी दशा उसे नामर्द नहीं बनाती।

शीघ्र पतन यह एक बहुत ही प्रचलित भ्रम है कि स्त्री को संतुष्ट करने के लिये पुरुष को अपना वीर्यपात ज़्यादा से ज़्यादा देर रोक कर रखना चाहिये व स्त्री और पुरुष को साथ-साथ ही चरम सीमा पर पहुँचना चाहिये। जो पुरुष ऐसा ना कर पायें उन्हें शीघ्रपतन का 'रोगी' माना जाता है और इसे भी नामर्दी की संज्ञा दी जाती है।

पर सच तो यह है कि प्रकृति ने ऐसा बनाया ही नहीं कि पुरुष और स्त्री को साथ-साथ वीर्यपात व योनिपात हों।  पुरुष की शारीरिक रचना ऐसी होती है कि उसकी चरमसीमा पहले आती है। और वीर्यपात की अवधि कई मानसिक व  भावनात्मक बातों पर भी निर्भर करता है। इन पर भी सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाओं का प्रभाव पडता है। अतः यह पुरुष को नामर्द की संज्ञा देने के लिये उचित स्थिति नहीं है।

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बच्चा पैदा ना कर पानाः

अगर कोई जोडा बच्चे पैदा नहीं कर पाता तो यह समझा जाता है कि पुरुष नपुंसक या नामर्द है। पर ऐसे लगभग सभी स्थितियों में पुरुषों के लिंग में पूरा तनाव होता है, उनका वीर्यपात आम पुरुषों की तरह होता है और वे आम पुरुषों की भांति ही सेक्स का आनंद दे या ले सकते हैं।

दूसरी तरफ बच्चा पैदा करने के लिये पुरुष के लिंग में तनाव आने या स्त्री को संतुष्ट करने या फिर सेक्स का आनंद लेने की कोई जरूरत नहीं होती। स्त्री की योनि में अगर कुछ बूंदें भी वीर्य की चली जायें -- चाहे लिंग उसकी योनि में गया भी ना हो, तो भी गर्भ ठहर सकता है।

अतः बच्चा पैदा करने या ना करने से कोई मर्द या नामर्द नहीं हो सकता।

बच्चा ना पैदा हो पाने के कई दूसरे कारण होते हैं जो कि पुरुष या स्त्री किसी में भी हो सकते हैं। आखिरकार हम उस औरत को जो बच्चा पैदा नहीं कर सकती ''नाऔरत'' तो नहीं कहते?

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हिजड़ा या छक्का:

हिजड़ा भारत में ऐसे व्यक्तियों का समुदाय है जो कि तृतीय लिंगी माने जाते हैं। माने ना ही वे पुरुष होते हैं और ना ही स्त्री। दरअसल ऐसे लोग पैदा तो नर के रूप में ही होते हैं पर वे अपने आप को अंदर से स्त्री ही मानते हैं। यह स्थिति पूर्णतया प्राकृतिक है।

अधिकतर हिजड़े अपना लिंग कटवा लेते हैं -- क्योंकि इससे वे संकेतात्मक रूप से स्त्री जाति के और भी करीब हो जाते हैं। अधिकतर हिजड़े स्त्रियोँ की पोशाकें पहनते हैं, स्त्रियोँ के नाम रखते हैं और उन्हीं की तरह आचरण करते हैं।

हिजड़े समुदाय में कुछ और व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं -- जैसे नपुंसक पुरुष --- यानि वह पुरुष जिसका लिंग कट चुका है या वह जन्म से ही नहीं था, पर जो अपने आप को स्त्री नहीं समझते और पुरुषों की भांति ही रहते हैं।

इसके अलावा उभयलिंगी व्यक्ति -- यानि वह व्यक्ति जिनके बाहरी यौन अंग स्त्रियोँ और पुरुषों दोनों के ही होते हैं, व मिश्रित लिंगी व्यक्ति शामिल हैं। मिश्रित लिंगी व्यक्ति वे होते हैं जिनके बाहरी यौन अंग एक लिंग के होते हैं और आंतरिक यौन अंग दूसरे लिंग के। उदाहरण के लिये जिनका बाहर से लिंग हो और भीतर गर्भाशय और अंडाशय हों।

ऊपर वर्णित सभी लोग हिजड़े नहीं बन जाते। इनमें बहुत से लोग हमारी भांति ही सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं पर अपनी स्थिति दूसरों से छिपा कर रखते हैं।

हिजड़े जब कि ना हीं पुरुष रह जाते हैं और ना हीं स्त्री, फिर भी उन्हें 'नामर्द' कहना उचित नहीं होगा। किसी व्यक्ति की पहचान जो वह है उससे होनी चाहिये ना कि जो वह नहीं है।

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नामर्द शब्द एक खोखला डर है

तो अब हम यह जान गये हैं कि नामर्द, लड़की, होमो जैसे शब्द केवल लड़कों को डरा कर उनका यौन व्यवहार समाज के अनावश्यक भूमिकाओं के हिसाब से नियंत्रित करने के लिये है। सभी पुरुषों को कुछ सवाल एक दूसरे से ê