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Thursday 28 August, 2008
 20:33 | 9/Dec/2007 |  0 Comment(s)
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2 मर्दानगी -- पुरुष प्रकृति

 

 

सेक्स की ताकत

पुरुषों को गुलाम बनाने का षडयंत्र

पुरुष होने की सबसे अजीब बात यह है कि जहां उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी स्त्रियों के प्रति सेक्स की जरूरत ही उनकी असली ताकत है, यह उन्हें असल में गुलाम बना देती है -- स्त्रियों का भी और सामाजिक भूमिकाओं का भी पारम्परागत समाज में क्योंकि स्त्रियों की यौनिकता पर अंकुश होता है इसी वजह से वे स्त्रियों के गुलाम कम और सामाजिक भमिकाओं के गुलाम ज़्यादा होते हैं या ये कहें कि वे स्त्रियों के यौन रुप से गुलामी तो करते हैं पर इसके एवज में उन्हें स्त्रियों पर कुछ सामाजिक अधिकार भी मिलते हैं पर एक पाश्चात्य विषमलैंगिक  समाज में वे पूर्ण रुप से स्त्रियों के गुलाम हो जाते हैं

मीडिया और आधुनिक संस्कृति इस झूठे प्रचार को और भी पेचीदा बना देते हैं। वे पुरुषों के कथित सेक्स की ताकत को बढ़ा-चढ़ा कर असलियत के विपरीत पेश करते हैं। क्योंकि पुरुष इन बेसिरपैर के लक्ष्यों को पाने में असफल होते हैं उनमें कई तरह की हीन भावनाऐं घर कर लेती हैं जो कि उनके व्यक्तित्व को व उनके यौन संबंधों पर दुष्प्रभाव डालते हैं। और साथ ही साथ उनकी प्राकृतिक मर्दानगी भी आहत होती है। और फिर हममें से वे पुरुष भी हैं जो कि अपनी काल्पनिक सेक्स की पौवर के झूठे किस्से लोगों को सुनाते हैं -- अपनी धाक जमाने के लिये, पर इस प्रक्रिया में दूसरे पुरुषों को अधूरा और हीन महसूस कराते हैं।

इस झूठे प्रचार का एक अंजाम तो यह होता है कि जिन लड़कों ने अभी लड़कियों से सेक्स नहीं किया है उनपर वे लड़के हावी हो जाते हैं जिन्होंने सेक्स किया होता है और जो इसे ऐसे बताते हैं जैसे उन्होंने कोई किला फतह कर लिया हो। जिस काम के लिये उनके पास कोई खास गुण, कोई खास कला, और कोई खास हिम्मत थी। वे इस को अंजान लड़कों को इस तरह से बताते हैं जैसे कि यह माउंट ऐवरेस्ट पर चढ़ाई चढ़ने जैसा मुश्किल काम था।

केस स्टडी

रमेश अपनी क्लास का एक सीधा-सादा लड़का है। उसके क्लास में एक दादा किस्म का लड़का है सोनू, जो कि दावा करता है कि उसने लड़कियों से सेक्स किया हुआ है। सोनू रमेश को हमेशा चिढ़ाता रहता है, सिर्फ़ इसीलिये कि रमेश सीधा है।

एक रोज, सबके सामने वह रमेश से कहता है कि रमेश कभी भी किसी लड़की को संतुष्ट नहीं कर पायेगा क्योंकि इसके लिये लड़की को 'गर्म' करना पडता है और यह उसके बस का नहीं है।

रमेश समझता है कि सोनू को सेक्स के बारे में सब मालुम है और वह उसकी इस बात पर भी विश्वास कर लेता है। उसे तो सचमुच नहीं पता कि लड़की को कैसे 'गर्म' करते हैं। अब इस बात से उसके अंदर एक गहरी हीन भावना घर कर जाती है। और हालांकि उसने अपने इस डर के बारे में किसी को भी नहीं बताया, यह उसके व्यक्तित्व व आत्म-विश्वास को कमजोर बना रहा है।

कई तरह के इश्तहार जो कि ढोंगियों द्वारा लगाये जाते हैं और यहां तक कि कई तरह की सेक्स की मैगजीने भी पुरुषों को इस बात पर डराती रहती हैं। वे लोगों के दिलों में यह फितूर भर देती हैं कि लड़की से सेक्स करना कोई तीर मारने जैसा काम है। पर इन बातों से उन पुरुषों की और चांदी हो जाती है जिन्होंने लड़कियों लड़कियों से सेक्स कर के अपनी 'मर्दानगी साबित' कर दी है और अब दूसरों पर धौंस जमाते हैं।

केस स्टडी

एक हिंदी की पत्रिका 'सरस कथाऐं' जो वैसे तो एक अश्लील मैगज़ीन है पर सेक्स पर एक गंभीर मैगज़ीन होने का दावा करती है, ने अपने मार्च 2004 अंक में एक तथाकथित 'सच्ची घटना' छापी जिसमें एक औरत एक पुरुष से गाली देते हुये कहती है, ''तू समझता है तू आदमी है . . . . . . . . . . तू फटा हुआ गुब्बारा है, तुझसे औरत के शरीर की गर्मी तो बर्दाश्त होती नहीं . . . . . .. .और चला है आग से खेलने  . . . . . .  बता कहां है तेरी मर्दानगी  . . . . . . . .चल दिखा अपना दम!'' इस कहानी में जो आदमी है, जिसने अपनी भरसक कोशिश की थी और उससे दो बार संभोग कर चुका था, फिर भी उस औरत को संतुष्ट नहीं कर पाया था, सिर झुका कर केवल इतना ही कह पाया, ''सौरी!''

भारतीय पुरुष इस तरह की मानसिकता से इतने ग्रस्त हैं कि यार संस्था के पास परामर्श के लिये अक्सर यह सवाल आता है कि लड़की को गर्म कैसे किया जाये? या उसे सेक्स के लिये तैयार कैसे किया जाये ताकि उसे संतुष्टि मिल सके। अगर आदमी यह नहीं कर पाता तो यह समझा जाता है कि उसमें कोई कमी है।

परंपरागत रूप से जानवरों की हड्डियों से बनी दवाइयाँ पुरुष के सेक्स ताकत को बढ़ाने के लिये बडी तादाद में प्रयोग की जाती रही है। इनमें बाघों की हड्डियां, गेंडे के सींग, सांडे का तेल इत्यादि कई तरह के जानवरों से बनी दवाइयाँ शामिल हैं। इन्हें पाने के लिये जानवरों पर बहुत अत्याचार किया जाता है। इनकी वजह से ही कई जानवर खत्म होने की कगार पर आ गये हैं। पर इन दवाईयों से सचमुच कोई भी फर्क नहीं पडता।

 

सेक्स के पौवर की सच्चाई

 सेक्स केवल एक प्राकृतिक जरूरत है। जैसे कि भूख और प्यास। यह एक आनंददायक अनुभूति है और एक ऐसी क्रिया है जिससे दो व्यक्ति एक दूसरे से मजबूत बंधन में बंध सकते हैं। यह केवल महसूस करने की चीज है। इसकी अनुभूति केवल वैसे ही, वहां ही और उस से ही लेनी चाहिये जो हमारी स्वाभाविक जरूरतों के अनुरूप हो।

सेक्स को पौवर के साथ जोडने की वजह से यौन भावनाऐं अधिकतर पुरुषों के लिये एक बोझ बन गई हैं। यह वो चीज नहीं रह गई हैं जिन्हें पुरुष अपने स्वाभाविक रूप से आनंद ले पाये।  अब उनकी कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि वे स्त्रियोँ को कितनी अच्छी तरह से संतुष्ट व खुश कर सकते हैं। जैसे कि वह स्त्रियोँ की यौन संतुष्टि के लिये बने गुलाम हों। युवा पुरुष रात दिन बस इसी चिंता में घुलते रहते हैं कि वे स्त्रियोँ को ढंग से संतुष्ट कर पायेंगे कि नहीं।  और जैसे अपनी ही बेवकूफी को साबित करना चाहते हों, वे एक दूसरे के साथ सेक्स की ताकत को लेकर प्रतिस्परधा करते हैं और अपने यौन व्यवहार को अपनी ताकत के सबूत के रूप में प्रर्दशित करते रहते हैं।

यह बात सुनने में बहुत ही अजीब लगती है कि पुरुष की मर्दानगी और उसका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपना वीर्यपात योनि में कर पाता है कि नहीं। इस पर विश्वास ही नहीं होता।

यह तथा-कथित ताकत बहुत ही सस्ते में मिलती है।  पुरुष को इसके लिये कोई मेहनत नहीं करनी पडती। इसे पाने के लिये आपके पास किसी भी मर्दाना गुण होने की जरूरत नहीं होती। इसमें कोई कमाल नहीं है और किसी पुरुष की मर्दानगी का आंकलन करने का यह बडा ही घटिया तरीका है।

सेक्स करना इस दुनिया की सबसे आसान चीजों में से एक है। चाहे वह स्त्री से हो या पुरुष से। सेक्स एक प्राकृतिक चीज है और अगर आप इसे अपनी स्वाभाविक जरूरतों और इच्छाओं के हिसाब से करें तो इसमें किसी खास काबलियत की जरूरत नहीं पडती। यह स्वतः ही हो जाता है।

सेक्स इस दुनिया की सबसे आसानी से करने और भोगने वाली क्रिया होनी चाहिये थी। पर झूठी सामाजिक मर्दानगी के बोझ की वजह से यह दोनो ही नहीं रही।

ताकत तो दूर की बात है, सेक्स की जरूरत को पुरुष के लिये सबसे कमजोर करने वाली चीज बना दिया गया है। स्त्रियां, खासतौर पर यौन रूप से अग्रसर स्त्रियां पुरुषों की इस कमजोरी को अच्छी तरह से समझती हैं और इससे उन्हें जो असली ताकत मिलती है इसका भी उन्हें इल्म है। और उन्हें इस ताकत को पुरुषों के खिलाफ प्रयोग करने में कोई एतराज़ नहीं होता। वे अनिच्छुक पुरुषों से सेक्स की मांग कर सकती हैं और अगर वे आनाकानी करें तो उन्हें हीन भावना से ग्रसित कर सकती हैं। जैसे कि उन्होंने कोई पाप कर दिया हो। वे खुद को संतुष्ट कर पाने में पुरुषों की वफिलता का हवाला देकर उनको नीचा दिखाती हैं व उनको बस में रखती हैं।  स्त्रियोँ को पुरुषों को मर्द या नामर्द करार देने की ताकत दी गयी है।

सच्चाई तो यह है कि पुरुषों की सामाजिक मर्दानगी उनसे उनके सेक्स की ताकत छीन लेती है। ताकत और गुलामी साथ-साथ नहीं चलते। ये ताकत सिर्फ़ एक छलावा है। केवल यह गुलामी ही मर्दों की सबसे बडी सच्चाई है।

सेक्स ताकत नहीं है

 

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