पुरुषों की सामाजिक व सेक्स संबंधी भूमिकाओं को उनपर कैसे लादा जाता है? समाज एक ऐसा नकली वातावरण तैयार कर देता है जहां पुरुष काफी कम उम्र से ही यह मानने लगते हैं कि मर्दानगी की सामाजिक भूमिकाऐं कुदरती हैं और वे अपनी सारी की सारी ताकत इन सामाजिक आदर्शों में ढलने मे लगा देते हैं। अपने बचपन से ही लड़के अपने आसपास के बडे पुरुषों का व्यवहार देखते हैं। वे सामाजिक मर्दानगी की प्रथम शिक्षा अपने पिता, अंकलों, बड़े भाइयों आदि के व्यवहारों को देखकर ग्रहण करते हैं। उनके परिवार के सदस्य भी -- चाहे पुरुष हों या स्त्री, उन्हें बताते रहते हैं कि क्या लड़कों के लिये उपयुक्त् व्यवहार है और क्या नहीं। उदाहरण के लिये माताऐं अपने लड़कों को रसोइ से बाहर रहने की हिदायत दे सकती हैं क्योंकि लड़कों के लिये यह सही जगह नहीं है। जब लड़के रोते हैं तो उनका मजाक उडाया जाता है। इससे लड़के सीखते हैं कि पुरुषों को रोना नहीं चाहिये -- उन्हें चोट पहुँचे तो भी नहीं। केस स्टडी जब सुरेश 10वीं कक्षा में था तो उसके पिता ने एक बार उसे रिश्तेदारों के सामने एक छोटी सी बात पर बहुत फटकार लगायी। सुरेश यह बर्दाश्त नहीं कर पाया और जब उसकी आंटी उसे तसल्ली दे रही थीं तो ना चाहते हुये भी उसकी आंखों में आंसू आ गये। इसपर उसकी आंटी ने उसे फटकारते हुये कहा, ''क्या लड़कियों की तरह रो रहे हो! मर्द बनना सीखो।'' सुरेश ने ऐसा वाक्य पहली बार सुना था। यह बात उसे अंदर तक असर कर गयी। उसके बाद उसने अपने आप को एकदम लोहे जैसा बना लिया। आज बडे होने पर उसे किसी दूसरे व्यक्ति के सामने रोने में बहुत दिक्कत महसूस होती है -- अगर वह चाहे तो भी आंसू निकलते ही नहीं। वह अपनी भावनाओं को बहुत ही कठोरता से दूसरों से छिपा कर रखता है। इन सब से वह बडी ही तनावपूर्ण जिंदगी व्यतीत करता है। |
नकली मर्दानगी की ये भूमिकाऐं सबसे ज़्यादा मीडिया और साथियों के दबाव द्वारा थोपी जाती हैं। आइये देखें कैसे। मीडिया की भूमिका मीडिया सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाओं को पुरुषों पर थोपने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है -- खासतौर पर नौजवानों के ऊपर। ग्लोबलाइज़ेशन से पहले इसमें हिंदी फिल्मों का ज़्यादा हाथ था। इनमें पुरुष लड़ाई -झगडे करते थे, लड़कियों के पीछे भागते थे और सिगरेट आदि पीते थे, जिन चीजों ने इस युग के पुरुषों का व्यवहार निर्धारित किया। पर आज के दौर में मीडिया जो भूमिकाऐं पुरुषों पर थोपती है उससे यह कहीं ज़्यादा बेहतर थे। आज के ग्लोबलाइज़ेशन के युग में मीडिया भारत में पश्चिमी सभ्यता लादने के लिये जरूरत से ज़्यादा उत्सुक है, और बेलगाम भी। इस में पश्चिमी मर्दानगी के मूल्य व भूमिकाऐं भी शामिल हैं। और हिंदी फिल्मों का महत्व आज काफी कम हो गया है और उसकी जगह टी वी ने ले ली है। हिंदी फिल्में भी आजकल हूबहू पाश्चात्य फिल्मों की नकल हो गयी हैं। आज के लड़के ऐसे कार्टून देखते बडे हो रहे हैं जहां पुरुषों के व्यवहार उससे बिल्कुल अलग हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। धीरे-धीरे लड़के इन गैर वास्तविक छवियों से जुडने लगते हैं और इससे पूरी संस्कृति में बदलाव आ जाता है। अमेरिका में बनी ये कार्टून फिल्म जिन्हें देख देख कर भारतीय युवा बडा हो रहा है, 10 और 12 वर्ष के लड़कों को भी लड़कियों के पीछे भागते और उनसे प्रेम करते और उन्हें 'डेट' करते दिखाते हैं। वहीं दूसरे लड़कों से ज़्यादा नज़दीकी या उनसे जुडने की ईच्छा को पुरुषों के विपरीत कार्य के रूप में पेश किया जा रहा है। केस स्टडी जौनी ब्रावो नाम का कार्टून चरित्र, जो कि कार्टून नेटवर्क पर काफी लोकप्रिय है, अपना सारा समय लड़कियों के पीछे भागने में बिताता है। वह अक्सर उन्हें बाहों में भरते या उन्हें किस करते हुये दिखाया जाता है। एक बार जब उससे पूछा गया कि क्या उसने कभी किसी लड़के को 'किस' किया है तो उसने एक धिनौना सा पुंह बनाते हुये कहा, ''कभी नहीं!'' |
केस स्टडी एक बच्चों के सीरियल में एक 9 वर्षीय लड़के को अपने ही क्लास की एक लड़की से इश्क करते और उसकी चाकरी करते दिखाया है। साथ ही साथ वह उस लड़की के लिये अपने दोस्त से प्रतिस्पर्धा भी करता है। |
पाश्चिमी चैनल लड़कों को ऐसे व्यवहार करने पर मजबूर करते हैं जो कि पहले समाज में बिल्कुल अस्वीकार थे। इतनी छोटी उम्र में इस तरह के व्यवहार उनके प्राकृतिक स्वभाव के विपरीत भी हैं। पर जब बच्चे और युवा वर्ग मीडिया पर किसी ताकतवर मर्द की छवि वाले पुरुष को कोई खास क्रिया करते देखते हैं तो वह उसे सच मान बैठते हैं। और वे अपनी मर्दानगी को साबित करने के लिये वैसे ही कार्य करने की चेष्टा करते हैं। कडे प्रतिस्पर्धा वाले मर्दानगी की दौड में यह करना और भी लाजमी हो जाता है जहां जो लड़का इन मूल्यों को पहले ग्रहण करता है वही आगे निकल जाता है। मीडिया पुरुषों के जीवन को बनाने में एक जिम्मेदार भूमिका अदा कर सकती है। पर, दुर्भाग्यवश वह ऐसा नही कर रही है। ग्लोबलाइजेशन से भारतीय उच्च वर्ग की पश्चिमी समाज की नकल उतारने की प्रवर्ति बेलगाम हो गयी है। इसने इसे वैधता भी प्रदान की है। केस स्टडी ग्लोबलाइजेशन से पहले का एक ऐड: एक लंबे-चौडे और आकर्षक 'मर्द' से एक 'सेक्सी' ड्रेस पहने एक लड़की लिफ़्ट मांगती है -- उसे अपनी सेक्सी अदाओं से प्रलोभन देते हुये। वह लड़का एस लड़की को देख कर शरारती तरह से मुस्कराता है और वह उसे इस बात का सिगनल समझती है कि वह उसे बुला रहा है। जैसे ही वह रंगीनी तबियत वाली एक 'सेक्सी' लड़की जो कि बडे ही चुस्त और छोटे कपडे पहने हुये है, एक बलिष्ठ नौजवान से जो कि मोटरसाइकिल चला रहा है, लिफ़्ट मांगती है। उसके अंदाज़ से यह साफ ज़ाहिर हो रहा है कि वह लिफ़्ट से ज़्यादा भी कुछ चाहती है। लड़का उसे देख कर एक शरारत भरे अंदाज में मुस्कुराता है और बडे अंदाज़ के साथ मोटरसाइकिल रोक देता है। लड़की समझती है कि वह उसे अपने साथ आने का निमंत्रण दे रहा है। आसपास कई लोग खडे हैं। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ, लोगों को अनदेखा कर, मोटरसाइकिल पर बैठने जा ही रही थी कि लड़के ने शरारती अंदाज में मोटरसाइकिल को रेस दी और वहां से बिना लड़की को लिये ही चला गया। लड़की सब के सामने झेंप गयी। ग्लोबलाइजेशन के बाद का ऐड इस ऐड को नीचा दिखाने के लिये और मर्दानगी के ऐसे मूल्यों को खत्म करने के लिये आज के दौर के मीडिया ने एक ऐसा ऐड बनाया जहां कि एक ऐसा ही बजिष्ठ नौजवान एक सेक्सी लड़की को लिफ़्ट देने के लिये नहीं रुकता। इस घटना को एक 'मजाकिया' मोड देने के लिये, मोटरसाइकिल उस युवा के इस रवैये पर बहुत गुस्सा हो जाता है क्योकि वह उस लड़की को बिठाना चाहता था, और उसे रास्ते में पटक देता है जिससे उसकी हड्डी पसली टूट जाती है। इस युवक को जोकर के रूप में पेश किया जाता है। मोटरसाइकिल वापिस लड़की के पास जाती है -- बिना सवार के, और उसपर डोरे डालता है। साथ ही वह उस लड़के पर फब्ती कसता है कि उसे के पास 'पौवर' नहीं है -- जिसका अर्थ हुआ कि उसके मास मर्दानगी नहीं है। मीडिया जहां एक ओर पुरुषों का व्यवहार बदलने में लगी हुई है वहीं वह साथ ही साथ स्त्रियोँ के मूल्य भी बदलने में लगी हुई है। वह लगातार स्ि=यों में यौन आक्रामकता और संलग्नता को बढ़ावा दे रही है। |
केस स्टडी एक इश्तहार में एक सुदर और आर्कषक लड़की जिसने ढंग के कपडे पहने है, एक हाWल में घुसती है जो शायद कोई पार्टी या शराबखाना है। वह मन ही मन सोच रही है कि उसका मर्द साथी आज कौन होगा। एक खास ब्रंड के हेयर कंडीशनर लगाने से उसमें आत्मविश्वास आ गया है और हर लड़के की नजर उस पर ही है। ऐसी कोशिश की जा रही है कि शादी से पहले 'डेिंटंग' का चलन लड़कियों के लिये समाज में स्वीकार्य हो जाये। केस स्टडी एक हिंदी के पारिवारक कौमेडी सीरियल में एक आम औफिस में कार्यरत लड़की को अपने बौस को यह कहते दिखाया गया है कि उसके बौयÝेंड का फोन आया है। इस बात को ऐसे अंदाज में दिखाया गया है जैसे भारत में यह बात बहुत आम व स्वीकार्य बात हो। |
युवा लड़के और लड़कियों को हर जगह एक दूसरे के साथ शारीरिक नजदीकी में दिखाया जाता है। सेक्स की क्रिया में संलग्न स्त्री पुरुष से लेकर एक दूसरे से अश्लील रूप से चपिके या छूते स्त्री पुरुषों से लेकर ऐसी मुद्राओं तक जो कि शायद केवल दोस्ताना हैं। युवा लोगों में स्त्री-पुरुष शारीरिक नजदीकी का प्रचलन चलाने की जी तोड कोशिश की जा रही है। खासतौर पर लड़कियों को यौन रूप से आक्रामक स्थितिओं में दिखाया जा रहा है -- जिससे लड़कियों की सामाजिक मर्यादा टूट पाये। पर इन सब की वजह से समाज में अनेकों समस्याऐं जन्म ले सकती हैं जिससे मीडिया को कोई फर्क नहीं पडता। एक तो यह सब एक ऐसी मानसिकता को जन्म दे रहे हैं जहां स्त्री पुरुष सेक्स को एक 'कैज़्युअल' चीज के रूप में लिया जा रहा है। और ऐसे संबंधों की जो पारिवारिक या शादी या प्रजनन से संबंधित जो मूल्य हैं वे टूटते जा रहे है। यह एक ऐसी गलत धारणा को जन्म दे रही हैं कि सभी 'नाWर्मल' लड़के लड़कियों का एक दूसरे से डेट करना स्वाभाविक है। टवी पर ऐसा कोई भी प्रोग्राम नहीं है जहां कि एक नाWर्मल नौजवान लड़का किसी लड़की से प्यार नहीं करता। इनकी माने तो लड़कों के पास लड़कियों से प्यार करने और संबंधों की समस्याओं से जूझने के सिवा और कोई काम नहीं है खासतौर पर हीरो का चरित्र जिन्हें सभी लड़के अपना आदर्श मानते हैं। साथ ही साथ मीडिया एक ऐसी मर्दानगी की छवि बना रही है जो लड़कों को एक दूसरे से तोडती है और उनसे एक दूसरे से जुडने की क्षमता को छीन लेती है। साथ ही उन्हें लड़कियों से जुडने पर मजबूर करती है -- जो कि इस उम्र के लिये कदपि स्वाभाविक नहीं है। अमेरिका में मीडिया ने ऐसा नकारात्मक प्रचार किया है कि वहां दो दोस्त सब के सामने एक दूसरे को छूने या उनका हाथ पकडने से भी कतराते हैं, ताकि कोई उन्हें 'होमो' ना समझ ले। पश्चिमी समाज में पुरुष एक दूसरे के बीच बहुत ही सतर्कता से रहते हैं और एक दूसरे से शारीरिक दूरी बना कर रहते हैं। बिल्कुल ऐसी ही मानकिकता भारत में पैदा करने की कोशिश की जा रही है। केस स्टडी कई बार दोहराये गये कार्टून नेटवर्क के एक इश्तहार में एक 'मर्द' बिल्ला सीना ठोंक कर कहता है: ''में औरतों के साथ नर्म और पुरुषों के साथ सख्त हूं''। केस स्टडी एक इश्तहार में एक लड़का और लडकी एक कमरे में अकेले बैठे टी वी देख रहे हैं। लड़का चाहता है कि वह वह प्रोग्राम देखे जहां बहुत सी सुंदर लड़कियाँ हैं जब कि लड़की चाहती है कि पुरुषों का एक बौडी-बिल्डिंग शो देखे। पुरुष उस बौडी-बिल्डिंग शो को देख कर बोर हो जाता है और उसे उन अधनंगे लड़कों को अपनी गठी हुई मांस पेशियाँ दिखाते देखने में कोई रुचि नहीं है। इस से ऐसी मानकिकता को बढ़ावा मिलता है कि पुरुषों को इस तरह की चीजों में आनंद नहीं लेना चाहिये। |
यह ना हीं सिर्फ़ हमारे परम्परागत मर्दानगी के मूल्यों के खिलाफ है बल्कि लड़को के स्वाभाविक पृविति के भी खिलाफ है। लड़के इस तरह की चीजों में खास रुचि लेते आये हैं। जब एक बलिष्ठ पुरुष तेज गाडी जलाता है, मारपीट करता है, दूसरे पुरुषों से बेरुखी से पूश आता है, कमजोर पुरुषों को नीचा दिखाता है, लड़कियों से सेक्स करता है और नशा करता है -- तो युवा लोग ऐसी छवियों के छलावे में आसानी से आ जाते हैं और अपना जीवन भी ऐसा ही बनाने की कोशिश करते हैं। कभी कभी जो चीज़ 'मर्दानगी' की निशानी दिखाई जाती है वह मर्दानगी की उलटी ही होती है। बाकी समय यह छवियाँ नकारात्मक मर्दानगी की होती हैं। मीडिया मर्दानगी के समारात्मक पहलुओं का चत्रिण करने में असफल रहा है। जैसे चरित्र, बहादुरी, हिम्मत, कमजोर का संरक्षण करना, सामाजिक जिम्मेदारी, आदद्यशों भरा जीवन, इज़्जत, इत्यादि। अतः आज के ये मर्द किसी कमजोर व्यक्ति को मारने के लिये समबसे आगे आयेंगे पर उसे बचाने से कतरायेंगे। केस स्टडी एक इश्तहार बच्चों को खुल्लम-खुल्ला सबक देता है: ''सीधे-सादे मत बनो!'' एक सीधा सादा व्यक्ति वह होता है जो कि धूर्त नहीं होता, दूसरों का नुकसान नहीं करता, आदर्शों और मूल्यों भरा जीवन व्यतीत करता है और किैज़्युल सेक्स से दूर रहता है। यह हमारे पहले के पूल्यों से कितना भिन्न है जब सीधे-सादे पुरुष ही उत्तम माने जाते थे। आज उसका मजाक उडाया जाता है। |
साथियों का दबाव झूठी मर्दानगी की इन भूमिकाओं को पुरुषों पर थोपने में सबसे अहम भूमिका साथियों के दबाव की होती है। ये वह साथी हैं लो हम उम्र हैं और जिनसे लड़का जुडना चाहता है। जब बालक बडे होते हैं और किशोरावस्था में आते हैं तो वे ये भूमिकाऐं अपने दोस्तों और दूसरे हम उम्र के लड़कों से ग्रहण करते हैं -- स्कूलों में, अपने मोहल्लों में , खेल के मैदानों जगहों में। किशोरावस्था के दौरान लड़का बाहद की दुनिया में अपनी एक जगह बनाना चाहता है और बाहर की दुनिया से उसका पहला संपर्क उसके हम उम्र दोस्त ही होते हैं। इससे पहले उसकी दुनिया उसके मां-बाप पऔर परिवार तक ही सीमित थी। अब उसके लिये यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वह अपने उन हम उम्रों द्वारा सम्मान के साथ स्वीकार किया जाये। लड़का अब बाहरी दुनिया में अपनी खुद की पहचान ढूंढ़ रहा है। अपने परिवार के रक्षात्मक परिवेश के परे। दुर्भाग्यवश, मिश्रितों की दुनिया ना केवल प्रतिस्पर्धा से भरी है पर बहुत क्रूर भी है। हम उम्रों के बीच मर्दानगी की दौड बहुत कडी है। जो भी इस दौड में आगे होगा वही अपने ग्रुप का नेता होगा और सभी उसका अनुसरण करेंगे। जो पीछे रह जायेगा उसकी दशा बहुत खराब हो सकती है। वह हास्या का पात्र बनेगा, नीचा दिखाया जायेगा, मारा-पीटा जायेगा और कोई उससे दोस्ती नहीं करना चाहेगा। इसी वजह से हम उप्र मिश्रित, खासतौर पर वे जो कि इस मर्दानगी की दौड में आगे रहते हैं, वे दूसरे मिश्रितों पर इन सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाओं का बोझ लादते हैं। इन दबावों में सिगरेट पीने, शराब पीने, लड़कियों छेडने, लड़कियों से सेक्स करने, मारपीट करने तेज गाडी चलाने आदि वे सभी चीजें शामिल हैं जिन्हें लड़के अक्सर नहीं करना चाहते। इस दौड में जो पीछे रह जाते हैं उनके लिये अपने आप को इस दौड में फिर से स्थापित करना काफी मुश्किल होता है। वे अक्सर एक हीन भावना लेकर, बिना दोस्तों के साथ के अकेले ही बडे होते हैं। इससे वे किशोरावस्था के उन सभी अच्छी चीजों से वंचित रह जाते हैं -- जिनमें खेल कूद और मस्ती भी शामिल हैं। यही सब हमें दूसरे लोगों से व्यवहार करना और दुनिया दारी सिखाते पर अधिकतर लड़के किसी ना किसी तरह से अपने आप को इस दौड में स्थापित कर ही लेते हैं। पर इसकी वजह से उनका जीवन कई तरह के तनावों से भर जाता है। और वे इस प्रक्रिया में पत्थर दिल, क्रूर, असंवेदनशील व खुदगर्ज़ बन जाते हैं। पुरुष इन्हीं अवगुणों से सारी उम्र जाना जाता है। पर यह सच्ची मर्दानगी नहीं है। कम से कम सकारात्मक मर्दानगी तो बिल्कुल नहीं है। दुर्भाग्यवश, पुरुषों के क्रूर संसार में रहने के लिये ऐसा ही बनना पडता है। लड़का सामाजिक अपेक्षाओं के आगे झुकना सीख जाते हैं अगर इससे उन्हें अपनी प्रकृति के खिलाफ जाना पडे तो भी। इन भूमिकाओं में फिट होने के लिये उन्हें छोटे-छोटे झूठ बोलने पड सकते हैं और यहां तक कि उनकी पूरी जिंदगी ही एक झूठ बन सकती है। केस स्टडी रितेश 11वीं कक्षा में है। वह अपने इस नये स्कूल में हाल में ही आया है। वह नर्वस है और अपने साथियों के बीच एक सम्मानजनक जगह बनाने की चिंता उसे परेशान कर रही है। वह लड़कों के बीच प्रतिस्पर्धा को महसूस कर सकता है। उसकी कक्षा के दो दादा किस्म के लड़कों ने उससे दोस्ती में दिलचस्पी दिखायी और वह उन्हें नाराज नहीं करना चाहता। उन्होंने लंच में उसे एक सिगरेट पीने को दी। रितेश बहुत ही तनाव में आ जाता है। वह सिगरेट नहीं पीना चाहता पर वह ना करने से डरता है। वह एक कश लेता है और इससे वह खांसने लगता है। दोनों लड़के उसका मजाक उडाते हैं और वह शर्मिंदगी महसूस करता है। वह अगले पंाच दिनों तक अकेले में बैद्य कर कई सिगरेटें पीता है ताकि वह उनका आदि हो सके। |
केस स्टडी संजय 10वीं क्लास में है। वह स्र्पोटस में ठीक-ठाक है और क्रिकेट फुटबौल आदि खेलना पसंद करता है। पर संजय को टी वी पर क्रिकेट मैच देखना कतई पसंद नहीं है। उसे टी वी के आगे घंटों दूसरे लोगों को खेलते देखना बडा बोरिंग लगता है। इससे अच्छा वह बाहर जा कर खुद खेलना चाहेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि बाकी सभी लड़कों को टी वी पर मैच देखना बहुत अच्छा लगता है और ऐसे में संजय को लगता है कि वह बाकियों से कुछ अलग है। जब भी टी वी पर कोई मैच आता है सभी लड़के सारे काम छोड कर टी वी के आगे चपिक कर बैठ जाते हैं और ऐसे में संजय अकेला पड जाता है और समझ नहीं पाता कि क्या करे। एक रोज वह अपने मत्रि आनंद के साथ कही जा रहा था। आदनंद उससे कुछ साल बडा है और संजय उसे अपना आदर्श मानता है। आनंद उससे भारत पाकिसि्तान मैच के बारे में पूछता है और संजय कुछ शर्मिंदगी के साथ उसे बताता है कि वह क्रिकेट मैच नहीं देखता। आंनंद क्रिकेट का बहुत बडा फन है हालांकि उसे खेलने से ज़्यादा मैच देखने में रुचि है। वह वउसकी बात पर आश्चर्यचकति रह जाता है। वह संजय को नीचा दिखाने के अंदाज में कहता है कि अगर वह क्रिकेट नहीं देखता तो वह आदमी नहीं हो सकता। वह इसे ऐसे बताता है जैसे कि क्रिकेट मैच देखने में रुचि ना होना कोई बीमारी है। |
अस केस में आनंद को लगता है कि संजय के ऊपर यों सामाजिक मर्दानगी का दबाव डालना उसका कर्त्वय है। संजय को अपने बारे में बडा बुरा महसूस हुआ। वह आनंद की सभी बातों में चशि्वास करता है। अब उसमें एक हीन भावना घर कर गयी और वह समझने लगा कि उसमें कुछ कमी है क्योंकि वहि क्रिकेट मैच नहीं देखना चाहता। अगले एक हफ्ते तक वह अपने आप को क्रिकेट मैच देख्ने के लिये मजबूर करता है। उसे कुद समय के लिये तो अच्छा लगता है पर वह जल्दी ही बोर हो जाता है। उसे िडस्कवरल चैनल या दूसरे ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देखना ज़्यादा अच्छा लगता है। अब वह अपने आप से लड़ना छोडकर इसे अपनी कमजोरी के रूप में स्वीकार कर लेता है। पर उसके विचार तब बदल जाते हैं जब वह अपने बहुत ही काबिल अंकल से मिलता है जो कि उन्हें बेवकूफ समझते हैं जो अपना समय क्रिकेट मैच देखने में खराब करते हैं। केस स्टडी अंजन 11वीं कक्षा का छात्र है। उसकी अपनी कक्षा के दो दादा किस्म के लड़कों से दोस्ती है। वे तीनों मिलकर एक ऐसा ग्रुप बनाते हैं जिससे क्लास में हर कोई डरता है। उनकी दोस्ती पाकर अंजन बहुत ताकतवर और 'मर्द' महसूस करता है। लकिन जैसे-जैसे समय बीतता है अंजन को लगता है कि इन लड़कों के बारे में कई चीजें ऐसी हैं जो वह नहीं पसंद करता। लेकिन वह ऐसा कहने से डरता है क्योंकि उसे लगता है कि उसके दोस्त उसे छोड देंगे। उसेे उन लड़कों की बुरी आदतों में जबरन शामिल होना पडता है -- चाहें वह सिगरेट पीना हो या लड़कियां छेडना। पर हद तो तब हो गई जब उन दोनों लड़कों ने किसी बाहर के लड़के से झगडा कर लिया और उन्होंने अंजन से उस लड़के और उसके दोस्तों से मारपीट करने के लिये साथ चलने को कहा। अंजन डर गया। वह इन सब पचडे में नहीं पडना चाहता था। उसने सुना था कि वे बाहर के लड़के चाकू आदि भी इस्तेमाल करते थे। अंजन बडी मुश्किल से कोई बाना बना कर छूटा। पर अंजन को लगता है कि ऐसा फिर कभी हो सकता है और वह बार बार बहाने नहीं बना सकता। वह डरता है कि अगर वह ना कहेगा तो उसकी दोस्ती टूट जायेगी। फिर वे दोनों उसके दु'मन बन जायेंगे। वह उसका सारी क्लास में मजाक उडा सकते हैं। क्लास के लड़के तो उसे ही 'दादा' समझते हैं। इन सब बातों ने अंजन की जिंदगी बहुत ही तनावपूर्ण बना दी है और उसकी पडाई पर असर पड रहा है। पर लड़कों पर सबसे बडा बोझ 'सेक्स की पौवर' का होता है। खासतौर पर लड़कियों के प्रति अपना रुझान बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना। हम उम्र साथी लड़कों से मर्दानगी के नाम पर लड़कियां छेडने, उनके पीछे भागने और कभी-कभी उनसे सेक्स करने को कह सकते हैं। |
अधिकतर लड़के इन सब के लिये तैयार नहीं होते और इसी वजह से सबसे ज़्यादा तनाव में रहते हैं। वे या तो चुपचाप जैसा कहा जाता है करते जाते हैं या फिर इससे बचने की कोशिश करते हैं -- पर ऐसा करने पर उनका मजाक उडाया जा सकता है या नीचा दिखाया जा सकता है। इस तनाव से लड़कों की पढ़ाई और आत्म-विश्वास पर खासा असर पडता है। केस स्टडी रोज अपने स्कूल से घर जाते समय अजय के दोस्त रास्ते में स्कूल जाती लड़कियों को छेडते हैं। वे उनपर फिब्तयाँ कसते है& |
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