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Thursday 28 August, 2008
 20:30 | 9/Dec/2007 |  0 Comment(s)
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3 आइये मर्दानगी को समझें

 

मर्दाना व्यवहार क्या है और जनाना क्या?

 

क्या हम सिगरेट पीने से सचमुच और मर्दाना बन सकते हैं? या फिर लड़कियों का पीछा करने से? या बड़ी-बड़ी मूंछे रखने से?

क्या नृत्य जैसी चीज में भाग लेने से हम जनाने बन जायेंगे? क्या कानों में बाली पहनने से? या खाना बनाने से? या सबके सामने रोने से?

इसका जवाब बेहद आसान है। मर्दानगी या जनानापन हमारे अंदर होते हैं। क्रियाऐं और वस्तुऐं ना मर्दानी होती हैं और ना हीं जनानी। यह तो जो उस क्रिया को कर रहा होता है वही उसे जनाना या मर्दाना बना देता है।

अतः जब एक मर्दाना पुरुष नाचता है तो वह नाच खुद-ब-खुद मर्दाना हो जाता है। क्योंकि वह उस नृत्य में अपनी मर्दानगी भर देता है। एक जनाना पुरुष चाहे कितनी भी सिगरेट पी ले, या लड़कियों के पीछे भागे -- उसका स्त्रीत्व हमेशा झलकेगा।

सिगरेट, लड़कियाँ आदि को समाज ने गैर प्राकृतिक रूप से मर्दाने कार्य का दर्जा दिया है और इन्हें करने से हमें बस मर्दाना होने का भ्रम भर होता है।

यह कार्य कर के हम अपने मर्दानेपन को दुनिया के सामने जाहिर भी करना चाहते हैं।

पर हम यह क्रियाऐं सबसे ज्यादा इसीलिये करना चाहते हैं क्योंकि हम समझते हैं कि सभी पुरुष इन्हें करते हैं। और हम भी यही कार्य कर के उन पुरुषों के साथ जुड़ने की प्राकृतिक प्रवृति को निभा रहे होते हैं। यह 'जुड़ने' की भावना हमें मर्दाना महसूस कराती है। एक ऐसे समाज में जहाँ पुरुष दूसरे पुरुषों से काफी हद तक टूट चुके हैं, पुरुषों के लिये एक दूसरे से जुड़ने का शायद यही तरीका रह गया है।

पर यह जुड़ना कोई जुड़ना नहीं होता। यह तो केवल प्रतीकात्मक है। हमारा समाज लड़कों से एक दूसरे के साथ जुड़ने के सभी दायरे एक-एक कर के छीन रहा है। जिससे लड़कों के पास इन प्रतीकात्मक कार्वों का सहारा लेने के सिवा और कोइ चारा नहीं है।

एक पुरुष जिसे अपनी प्राकृतिक मर्दानगी पर पूरा विश्वास है, वह मर्द दिखने के लिये इन खोखले सामाजिक क्रियाओं पर  निर्भर नहीं होता। वह जानता है कि वह जो भी करे उसमें उसकी मर्दानगी की अपनी विशिष्ट छाप होगी। वह अगर लिपस्टिक भी लगायेगा तो भी वह मर्दाना दिखेगा।

और वह अपने अंदर मौजूद थोड़े से स्त्रीत्व को भी मर्दाने गर्व के साथ अपनाऐगा।

आइये अब सामाजिक मर्दानगी के सेक्स संबंधी मान्यताओं को परख कर देखते हैं कि उनकी सच्चाई क्या है।

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स्त्रियोँ के प्रति यौन रुझान

इये हम इस प्रचार को परख कर देखते हैं कि स्त्रियों से सेक्स करने से पुरुष मर्द बन जाता है या दूसरे शब्दों में कहें तो यह उसकी मर्दानगी का सबूत है। या फिर यह कि यह उसकी मर्दानगी का वजूद है।

जिन लड़कों की गर्लफ्रेंङ होती हैं या जो दावा करते हैं कि उन्होंने लड़कियों से सेक्स करा हुआ है उनके अंदर जो ताकत और मर्दानगी झलकती है वह कोई कैसे नजरअंदाज कर सकता है। आप उससे प्रभावति हुये बिना नहीं रह सकते। आप स्वतः ही उनका सम्मान करने लगते हैं और वे आपके आदर्श बन जाते हैं।  आप को यह साफ लगने लगता है कि वह पुरुष की क्या जब तक कि वह किसी स्त्री से सेक्स ना कर ले। इसमें आश्चर्य नहीं कि ऐसे लड़के हर जगह सीना तान कर चलते हैं और वे जहाँ भी जाते हैं दूसरे उनके अनुकरण करते हैं।

ऐसी क्या चीज है जो लड़कों को इतना मर्दाना बना देती है जब वे लड़कियों के साथ 'ङेटिंग' करते हैं।

अगर आपने अपने दोस्तों के साथ मिलकर लड़कियाँ छेड़ी हैं तो आप को याद होगा कि कैसे आप के अंदर अचानक ताकतवर होने की भावना छा जाती है। एक मर्द होने की भावना। आपने वही ताकत महसूस की होगी जब आप अपनी काॉलोनी की लड़की के चक्कर काटते हैं या फिर उसके साथ बस में आंखें मिलाते हैं। जब दूसरे आप को किसी लड़की के साथ जोड़ कर चिढ़ाते हैं तो वही मर्दानगी की लहर आप के अंदर फिर दौड़ पड़ती है। आज के दौर में अगर आप लड़की को 'ङेटिंग' पर ले जाते हैं तो यह मर्दानगी की भावना अपने चरमसीमा पर पहँच जाती है।

ऐसा कैसे मुमकिन है कि यह सब प्राकृतिक ना हो? अगर आप ने इस ताकत का स्वाद चख लिया हो तो आप इसकी और कामना क्योंकर नहीं करेंगे? यह तो साफ है कि स्त्रियों के प्रति यौन भावना होना ही पुरुष होने का मूल मंत्र है।

अतः आप को यह जितना भी मिले कम है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ स्त्रियों के प्रति यौन भावना दर्शाना सामाजिक मर्दानगी की दौड़ में अपनी ताकत दर्शाने के लिये जरूरी है, और जिससे उस दौड़  में एक पुरुष की स्थिति और रुतबे का पता चलता है वहाँ लड़कों के उपर इन भावनाओं को अपनी स्वाभाविक हद से कहीं ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने का दबाव बहुत तीव्र होता है। लड़के इन भावनाओं को लेकर अक्सर नाटक करते हैं। और जिन लड़कों में स्त्रियों के प्रति यौन भावना थोड़ी है या फिर है ही नहीं, वे चाहे अंदर से कितने भी मर्दाने क्यों ना हों -- ऐसी भावनाओं को दर्शाना उनके लिये पूरी तरह से नाटक हो जाता है। इस नाटक को करने की वजह से उनके अंदर गहरी हीन भावनाऐं घर कर लेती हैं और वे अपना राज़ अपनी जान से भी ज्यादा संजो कर रखते हैं। पर इसकी वजह से वे तनावग्रस्त हो जाते हैं। क्योंकि इस सारे ताकत के खेल में लड़कियों के प्रति यौन भावना ना होना एक विकृति, बीमारी या मर्दानगी की कमी समझी जाती है।

और फिर भी सच्चाई तो यह है कि यह अविश्वसनीय रूप से मदहोश कर देने वाली ताकत असली नहीं है। और ना हीं ये मर्दानगी की भावना प्राकृतिक है। यह मर्दानगी और ताकत की भावना कुछ तो इस भावना से आती है कि हम वह कार्य कर रहे हैं जो हमें लगता है कि सभी पुरुष करते हैं। लेकिन ये अधिकतर एक खास सामाजिक तंत्र की वजह से है जो बुरी तरह से भटक गया है। एक ऐसा तंत्र जहाँ सदियों से ऐसा ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि स्त्रियों से सेक्स करना ही मर्दानगी का आधार है। यह उस पेचीदे सामाजिक "इनाम-और-सजा" पद्धति का भाग है जो पुरुषों के यौन व्यवहार को नियंत्रित करने के लिये बनायी गई है।

यह तंत्र कुछ ढाई से तीन हजार वर्ष पूर्व बनाया गया था। इसका मकसद था पुरुषों की बच्चा पैदा करने और उन्हें पालने के काम में पूर्ण रूप से भागीदारी। एक ऐसे काल में जहाँ मानव सभ्यताओं को अपनी जनसंख्या तेजी से बढ़ाने की जरूरत थी।

क्योंकि, यथासंभव, पहले के पुरुष स्त्रियोँ से कम ही संभोग करते थे, ठीक जंगली जानवरों जिनमें मनुष्य का जंगली रिश्तेदार चिंपाज़ी भी है' की तरह जहाँ नर और मादा साल में केवल एक बार ही प्रजनन के लिये मिलते हैं और अधिकतर नर अपने जीवनकाल में कुछ बार ही प्रजनन क्रिया करते हैं। जंगली जानवरों में नर और मादा कभी साथ-साथ नहीं रहते। ना हीं नर बच्चों को बड़ा करने की जिम्मेदारी उठाते हैं।

शुरूआत के कबीलाई समाजों में बहुत कम पुरुष नियमानुसार प्रजनन की प्रक्रिया में भाग लेते थे। और बच्चों को बड़ा करने में तो उनकी बिल्कुल भागीदारी नहीं होती थी। वे तो बस शिकार करते और दूसरे कबीलों से अपने कबीले की रक्षा करते थे।

पर जब मनुष्य कबीलों को छोड़ कर सभ्यताऐं विकसित करने लगे तो उन्हें तेजी से अपनी जनसंख्या बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई। और इस तरह पहली बार समाजों ने पुरुषों पर स्त्रियों से संभोग करने के लिये जोर देना शुरू किया। इसके लिये उन्होंने उन्हें इनाम देने और ना मानने पर सजा देने की नीति अपनाई।

आज हमें अपनी जनसंख्या बढ़ाने की कतई जरूरत नहीं है। बल्कि जनसंख्या तो हमारी बर्बादी का कारण बन रही है। पर वह सामाजिक तंत्र जो विकसित हुआ था अब उसकी जड़ समाज में बुरी तरह से घर कर गई हैं। यहाँ तक कि हमारी धार्मिक परंपराऐं भी उनसे अछूती नहीं हैं। उदाहरण कि लिये हिंदू धर्म में हर पुरुष को शादी कर के लड़का पैदा करना अनिवार्य है।

ऐसे चंद पुरुष भी हैं जो इस तरह के पुरुष-विरोधी सामाजिक तंत्र की वजह से फायदे में रहते हैं और बिना कुछ किये बेशुमार सामाजिक ताकत के मालिक बन जाते हैं। ये लोग ही इस पद्धति को कायम रखने के लिये सबसे ज्यादा जोर लगाते हैं।

यह साबित करना तो बहुत ही आसान है कि स्त्रियों के साथ करना या ऐसी इच्छा का मन में होना अपने आप में कोइ मर्दाना गुण नहीं है। और ना हीं स्त्री को संतुष्ट करना। बल्कि अधिकतर मर्दाना पुरुष स्त्रियों को संतुष्ट करने में पूर्ण रूप से विफल रहते हैं।

पहला सबूत तो यह है कि अधिकतर तृतीय प्रकृति के व्यक्ति स्त्रियों से सेक्स करने और उन्हें संतुष्ट करने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं। इनमें वे हिजड़े भी शामिल हैं जिनका लिग कटा नहीं है। पश्चिमी समाज में इन लोगों को ट्रांसजेंर्डङ पुरुष कहा जाता है और गणनाओं के अनुसार करीब 90 प्रतशित ऐसे पुरुष स्त्रियों के साथ यौन संबंध बनाने के इच्छुक होते हैं। वे स्त्रियों को संतुष्ट करने में मर्दाने पुरुषों से ज्यादा सक्षम होते हैं क्योंकि उनमें स्त्रियों की समझ ज्यादा होती है। और संतुष्टि आपसी भावनात्मक नजदीकी और समझ से आती है, ना कि लिग के आकार या वीर्यपात की अवधि से।

नपुंसक पुरुष और ट्रांससेक्शुअल पुरुष जिन्होंने अपना लिग कटवाकर उसकी जगह औपरेशन से योनि लगवा ली है और स्त्रियाँ -- ये तीनों ही स्त्रियों से सेक्स करने और उन्हें संतुष्टि देने में मर्दाने पुरुषों से ज्यादा सक्षम हैं। ऐसे जोड़ों में आपस में पूर्ण रूप से समझ और नजदीकी होना मुमकिन होता है। समाज में एक मिथक है कि स्त्री को चरमसीमा तक पहँचने के लिये योनि मैथुन जरूरी है। दरअसल स्त्रियोँ की चरमसीमा उनके टिटनी को उत्तेजित करने से आती है। इसे उत्तेजित करना लिग से मुमकिन नहीं है पर उंगली या जीभ या किसी वस्तु से यह आसानी से हो सकती है।

दूसरा सबूत कि मर्दाना होने के लिये स्त्रियों के प्रति यौन ईच्छा का होना नहीं है, यह है कि सभी मर्दाने पुरुष स्त्रियों में रूचि नहीं रखते। बल्कि यह भी कहा जाता है कि जो पुरुष अति मर्दाने होते हैं उनकी यौन रुचि स्त्रियोँ में नहीं होती (हमारे अपने हनुमान जी)। पुरुषों की एक अच्छी खासी तादाद स्त्रियों में केवल यदा-कदा ही रुचि रखते हैं। जिस तरह की स्त्रियों के प्रति यौन की अतिईच्छा हमारा समाज पुरुषों से अपेक्षा करता है वह मर्दाने पुरुषों के लिये अस्वाभाविक है। वैसे भी लिगीय अंतर की वजह से मर्दाने पुरुष और स्त्रियोँ में बहुत ज्यादा घनिष्ठता मुश्किल होती है।

तो फिर एक ऐसी चीज जो जनाने पुरुष और स्त्रियां पुरुषों से बेहतर कर सकते हैं वह मर्दानगी की खास निशानी कैसे हो सकती है।

एक मर्दाना पुरुष मर्द बनने के लिये इन भावनाओं का मोहताज नहीं है। जो पुरुष प्राकृतिक रूप से मर्दाना है वह हर हाल में मर्दाना ही रहेगा -- चाहे स्त्रियों के प्रति यौन इच्छा हो या ना हो।

आज पश्चिमी जगत में पुरुषों के यौन व्यवहार को नियंत्रित करने वाला यह सामाजिक तंत्र अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है और इसने एक वषिमलैंगिक समाज का स्वरूप ले लिया है। यहाँ हर पुरुष और हर स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वे एक छोटी उम्र (स्कूल) से ही एक दूसरे के साथ 'ङेटिंग' पर जायें। यह पाश्चात्य लड़कों पर भारतीय लड़कों की अपेक्षा कई गुना अधिक दबाव ङालती हैं। भारत में यह दबाव केवल लड़कियों के प्रति यौन भावना दर्शाने या ज्यादा से ज्यादा उनसे सेक्स करने तक ही सीमति है। बहुत से पुरुषों के लिये 'ङेटिंग' एक तनाव पूर्ण कार्य है। और चाहे ये समाज स्त्रियों से घनिष्ठता को मर्दानगी की निशानी के रूप में पेश करें, पर सभी मर्दाने पुरुष स्त्रियोँ से घनिष्ठता बनाने की कामना नहीं करते।

इन पाश्चात्य समाजों के विपरीत अधिकतर पारम्परिक समाज स्त्रियोँ से घनिष्ठता को पुरुषों के मर्दानगी को कम करने वाला और उनमें स्त्रीत्व की भावना पैदा करने वाला कार्य मानते हैं।  सभी प्राचीन योद्धा परम्पराओं में -- जिनमें भारतीय अखाड़े भी शामिल हैं -- पुरुषों को अपनी मर्दानगी बचाने के लिये स्त्रियोँ से दूर रहने की हिदायत दी जाती है। आज से कुछ सालों पहले तक खि्लाड़ियों से भी ऐसी ही उम्मीद की जाती थी।

भारतीय शादियों में भी हाल ही तक पुरुष और स्त्री के बीच घनिष्ठता मुश्किल ही होती थी। अधिकतर, उनके संबंध सेक्स करने, बच्चों की परिवरिश और दुनियादारी के मामलों तक ही सीमति रहते थे।

जहाँ तक बच्चा पैदा करने की बात है तो उसके लिये स्त्री के प्रति यौन भावना का होना या ना होना आवश्यक नहीं है। पुरुष-स्त्री के बीच जरा से यौन संपर्क से जिसमें स्त्री की योनि में वीर्य की कुछ बूंदे भी गिर जायें वह बच्चा पैदा करने के लिये काफी हैं।

हमारा उद्देश्य यहाँ पर पुरुषों के स्त्रियों के प्रति यौन इच्छा को कम कर के आंकना या पुरुषों को इनसे निरुत्साहति करना नहीं है। हमारा उद्देश्य है पुरुषों पर से इन झूठी सामाजिक मर्दानगी के बोझों को कम करना और स्त्री-पुरुष सेक्स से जुड़े हौवे और मथि्यों को दूर करना। जिससे अपने स्वाभाविक रूप में रह पायें। उन्हें भी अपने प्राकृतिक स्वभाव और जरूरतों के मुताबिक महसूस और व्यवहार करने की आजादी हो।

जिससे झूठी मर्दानगी के ये अनुचित दबाव दूर हो पायें जो पुरुषों को ऐसे काम करने को बाध्य करते हैं जो स्त्री और पुरुष दोनों के लिये हानिकारक हैं।

इस खुलेपन, मानवधिकार और जायज़ समाज वाले दौर में यह बहुत ही नाजायज़ होगा कि पुरुषों को उनके पुराने दमनकारी मथि्यों के नियंत्रण में जीने को मजबूर किया जाये। अब समाज में हमारे युवावर्ग के साथ इस तरह की खुली चर्चा को रोकने का कोई औचित्य नहीं रह गया है।

स्त्री के साथ संबंध मर्दाने पुरुषों के लिये बेकार नहीं हैं। प्रजनन प्रक्रिया में उनका महत्वपूर्ण योगदान होने के साथ-साथ वे पुरुषों के जीवन में एक अत्यंत जरूरी संतुलन भी लाती हैं, क्योंकि वे पुरुषों को उनके स्त्रीत्व के संपर्क में ले आती हैं। पर एक पुरुष के जीवन में इन संबंधों को बनाने का एक सही समय और जगह है। युवावस्था का शुरू का चरण वह सही समय नहीं है। यह समय तो युवाओं का अपनी मर्दानगी विकसित करने और उसका आनंद लेने का है।

जय सरस्वती म     ां↑↑

 

पुरुषों से यौन रूप से जुड़ने की भावना

प्राचीन विश्व में दो पुरुषों के बीच प्रेम या शारीरिक घनिष्ठता किसी एक छोटे से वर्ग तक ही सीमति नहीं थी जैसा कि आज जताने की कोशिश की जा रही है। अधिकतर पुरुष ऐसे संबंध बनाते थे और इन संबंधों को सामाजिक मान्यता और बढ़ावा भी मिलता था। आज हम एक बिल्कुल दूसरी दुनिया में रहते हैं -- ऐसी दुनिया जो कि कम से कम दो हजार सालों से हो रहे ऐसे रिश्तों के दमन का नतीजा है।

प्राचीन काल में पुरुष-पुरुष प्रेम संबंधों के अधिकतर प्रमाण पिछली कई सदियों के दौरान नष्ट कर दिये गये हैं। पर कई फिर भी बच गये हैं -- प्राचीन यूनान से लेकर न्यू पापा गिनिया और अंङमान और निकोबार के प्राचीन आदिवासियों तक, यूरोप के कॅल्ट योद्धाओं से लेकर जापान के सामुराई योद्धाओं तक।

उदाहरण के लिये प्राचीन यूनान में युवा पुरुष अपनी नौजवानी के दौरान एक दूसरे युवा से 'शादी' करते थे। लड़की से शादी वे 30 वर्ष का होने के बाद ही करते थे।

 

p सिकंदर महान (356 - 323 BC)

उसने इस दुनिया को जीता पर उसे जीता उसके प्रेमी हिफेशियन ने --- वो जो उसके बचपन का दोस्त थ और कमांड में उससे दूसरे नंबर पर था। उसके प्रसिद्ध शब ्दहिफेशियन ही सिकंदर है अब अमर हो गये हैं।

p हिफेशियन (356 BC - 324 BC)

हिफेशियन सिकंदर से भी ज़्यादा हैंडसम और उस से भी ज़्यादा बेहतर योद्धा था

जब हिफैशियन युद्ध में मारा गया तो सिकंदर ने उसे देवता घोषित कर दिया। वो का उस की मौत को झेल नहीं पाया और 6 महीने के अंदर ही चल बसा।

ये सभी समाज योद्धा समाज थे और इनके शूरवीरों की मर्दानगी उनके पुरुष प्रेमी गठबंधनों से ही आती थी। प्रेमियों के जोड़े साथ-साथ दुश्मनों का मुकाबला करते, एक दूसरे की आखरी सांस तक रक्षा करते, जब उनका प्रेमी बीमार पड़ता तो उसकी देखभाल करते। और इसी तरह ऐसी कई प्रेम की कई दास्तानों ने जन्म लिया। उनमें से कई आज तक जिंदा हैं जैसे कि गिलगमेश और एनकीङू -- प्राचीन सुमेर में रहने वाले अपने जमाने के दो सबसे ताकतवर पुरुष जो कि पहले जानी दुश्मन थे पर बाद में एक अटूट बंधन में बंध गये, सिकंदर महान और हिफेशियन जो कि इस विश्व के सबसे महान विजेता थे और सबसे गहरे प्रेमियों से एक भी थे, राजा हेड्रियन और एंटोनियस, जहाँ हेड्रियन ने एंटोनियस को बचाने के लिये केवल अपने हाथों से एक भयावह शेर का मुकाबला किया और उसे मार ङाला। एंटोनियस की अकस्मात मृत्यु के बाद उसने उसकी याद में कई शहर बसाये और एक पूरे धर्म की स्थापना कर ङाली। उस संस्कृति में पुरुष-पुरुष प्रेम को सबसे मर्दाना और सबसे शुद्ध किस्म का प्रेम समझा जाता था।

जंगली जानवारों में भी नरों के बीच ऐसे ही गहरे और समर्पित यौन संबंध अब वैज्ञानिक खुल कर बता रहे हैं। पिछले कई सदियों तक उन्होंने इन बातों को समाज से छिपा कर रखा। ङोल्फिन मछली से लेकर हाथियों तक, भयावह शेरों से लेकर पेंगि्वनों तक और समुर्द जीवों से लेकर बड़े वानरों तक। इसमें जंगल में रहने वाले इंसान के सबसे करीबी रिश्तेदार चिंपाजी भी शामिल हैं। हमारे 98 प्रतशित जींस इनसे मिलते हैं। खौफनाक नर चिंपाज़ियों के समूह में नर एक दूसरे के हमेशा साथ रहते हैं। उनके रिश्ते इतने मजबूत इसीलिये होते हैं क्योंकि इसमें यौन प्रेम शामिल होता है। ये दल एक होकर शिकार करते हैं, दुश्मन वानरों से लड़ते हैं और उनसे एक दूसरे की रक्षा करते हैं। वे अपने जोड़ीदार को मादा चिंपाजियों के साथ प्रजनन के मौसम में मिलन करने में भी मदद करते हैं।

t दो नर भेड़ें आपस में संभोग करते हुये

आधुनिक वैज्ञानिक भी अब मानने लगे हैं कि मानव भी बाकी ही जंतुओं की तरह पुरुष और स्त्री दोनों से ही प्रेम संबंध कायम कर सकते हैं।

पुरुष अंदर ही अंदर यह बात हमेशा से समझते रहे हैं, पर वे यह भी समझते हैं कि इस तरह के संबंध समाज को नामंजूर हैं। उनको अपने ही बीच चंद ऐसे पुरुषों का भी एहसास है जो कि संख्या में कम होते हुये भी सामाजिक मर्दानगी के कारण बहुत ताकतवर हो गये हैं -- और जो इस ताकत का उपयोग इस तरह के संबंधों को दबाने और उनको नीचा दिखाने के लिये करते हैं।

परम्परागत भारतीय समाज में पुरुष अक्सर एक दूसरे के साथ गहरी दोस्ती कायम करते आये हैं जिसकी आड़ में पुरुषों को दबे रूप में एक दूसरे के प्रति यौनिकता को व्यक्त करने के बहुत से अवसर मिलते आये हैं। इन्हीं गहरे रिश्तों के संरक्षण में पुरुषों के बीच कई घनिष्ठ यौन संबंध चुपके-चुपके फलते-फूलते रहे हैं।  बेशक खासतौर पर स्त्रियों को इसकी भनक भी नहीं होती। और बशर्ते कि वे शादी कर के और बच्चा पैदा कर के अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाते रहें, समाज भी उनके इन मामलों को अनदेखा कर देता है।

चाहे पुरुषों का हमउम्र समाज एक पर्दे में बनाये गये इन रिश्तों को अपनी चुप्पी से स्वीकृति देता आया है पर वह इन भावनाओं को खुले रूप में व्यक्त करने के वह एकदम खिलाफ है।

चाहे भारतीय समाज पुरुष-पुरुष संबंधों को जानबूझ कर बढ़ावा नहीं देता था, पर पुरुष-पुरुष संबंधों को पनपने का मौका इसीलिये मिलता रहा है कि हम अभी भी ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ पुरुष और स्त्रियाँ एक दूसरे से अलग अपने-अपने समूह में रहते हैं और आपस में बहुत ज्यादा संर्पक नहीं करते। इसी वजह से स्त्रियों से सेक्स संबंधी सामाजिक मर्दानगी का दबाव भी काफी हद तक सरल रहता है। और आदमी को अपने स्वाभाविक रूप में रहने की काफी स्वतंत्रता रहती है। हमारे परम्परागत समाज में पुरुष-पुरुष संबंधों को एक खतरे की तरह नहीं देखा जाता। इसी वजह से यहां पुरुष-पुरुष संबंध बहुंतायत में, अदृश्य रूप से फलते-फूलते हैं। हमारा समाज पुरुष-स्त्री घनिष्ठता को खुले में देखना बर्दाश्त नहीं करता।

भारतीय समाज का पाश्चात्यीकरण इस परम्परागत मर्दानगी के चलन को तेजी से बदल रहा है। जो नया सामाजिक ढांचा आ रहा है उसमें पुरुष समाज को तोड़ कर उन्हें स्त्री-पुरुष मिश्रित-समाज बनाया जा रहा है। लड़कियों की अपनी अलग जगहें फिर भी सलामत हैं पर लड़कों की सभी जगहों में लड़कियों को शामिल किया जा रहा है। चाहे वह स्कूल हों या व्यायामशाला या स्वीमिंग पूल। समाज अब धीरे-धीरे लड़के-लड़कियों के उपर घनिष्ठ संबंध बनाने के लिये जोर ङाल रहा है। वह अब पाश्चात्य तौर तरीकों जैसे ङेटिंग इत्यादि को भारतीय लोगों पर थोप रहा है। इसके साथ ही साथ वह पुरुषों के बीच उन छिपी हुये संबंधों को जबरन खुले में लाकर उन्हें 'होमो' के दायरे में फेंक रहा है। यह दायरा परंपरागत समाज में केवल जनाना पुरुषों के लिये ही हुआ करते थे।

जहाँ आधुनिक पाश्चात्य समाज कैजुअल स्त्री-पुरुष संबंध को खुल कर बढ़ावा दे रहा है वहीं वह पुरुषों के बीच किसी भी नजदीकी को नीची निगाह से देखता है -- दोस्ती को भी। जहाँ आधुनिक समाज प&#