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Thursday 28 August, 2008
 20:29 | 9/Dec/2007 |  0 Comment(s)
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4 पुरुष और स्त्रीत्व

 

 

पुरुषों में स्त्रीत्व का मतलब है वह पुरुष स्त्रियों की भंति महसूस करता है, उसमें स्त्रीत्व उर्जा विद्यमान है और वह दूसरे पुरुषों व स्त्रियों में स्त्रीत्व को सराहता है। यह स्त्रियों या दूसरे जनाना पुरुषों से जुड़ने की भावना है।

 

अपने स्त्रीत्व को अपनाना:

म सभी द्वि-उर्जीय या द्वि-उर्जा वाले व्यक्ति हैं -- चाहे हम पुरुष हों या स्त्री। इसका मतलब यह हुआ कि हम सब के अंदर पौरुषत्व की और स्त्रीत्व दोनों की उर्जा विद्यमान है।

सभी प्राचीन संस्कृतियां इस तथ्य को मान्यता दती थीं -- चाहे वह हमारा स्वयँ का हिंदु दर्शन हो जो कि अर्धनारीश्वर (भगवान शंकर) की यानि एक ही व्यक्ति में नारी व नर दोनों के होने की बात करता है। या फिर अमरीका के प्राचीन इंडियन आदिवासी जो यह मानते थे कि हर स्त्री एक छोटे से लिंग के साथ पैदा होती है और हर पुरुष  के एक छोटी सी योनि/ मूत्राशय होता है।

फर्क सिर्फ इतना है कि अधिकतर पुरुषों में पौरुषत्व की भावना ज्यादा होती है और उनका शरीर इस पौरुष उर्जा का प्रयोग करने में ज्यादा सक्षम होता है। वहीं अधिकतर स्त्रियों में स्त्रीत्व की उर्जा ज्यादा होती है क्योंकि उनका मूलभूत कार्य प्रजनन व बच्चों की परवरिश है।

पर पुरुषों को भी स्त्रीत्व की उर्जा की जरूरत होती है, जिसके बगैर वे जीवन की कई चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते और अपने जीवन को भरसक नहीं जी सकते।

असली और सकारात्मक मर्दानगी अपने अंदर मौजूद इस थोड़े से स्त्रीत्व से डरती नहीं हैं। वे इससे भागती नहीं है बल्कि इसे गर्व के साथ अपना लेती है। यह मर्दों के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देती है।

 

द्वि-उर्जीय व्यक्ति

कुछ नर ऐसे भी हैं जिनमें पुरुष उर्जा की बजाय,स्त्री उर्जा की बहुतायत में है। यह एक पूर्णतया प्राकृतिक स्थिति होती है। ऐसे व्यक्ति अदभुत शक्ति वाले होते हैं। क्योंकि वे पुरुष के शारीरिक सार्मथ्य के साथ स्त्रीत्व की उर्जा को मिला देते हैं। इससे एक अनोखी ताकत का सृजन होता है। जो कि ना तो पुरुषों के पास होता है और ना हीं स्त्रियों के पास। ऐसे व्यक्ति अद~भुत सुंदरता का प्रतीक भी होते हैं जो कि पुरुष शरीर और स्त्री की आत्मा की सुंदरता को एक साथ मिला देते हैं। कुदरत ने ऐसे व्यक्तियों को इंसानों के जीवन में एक खास भूमिका प्रदान की है। वे स्त्री और पुरुष के बीच की कड़ी हैं जो स्त्री भी हैं और पुरुष भी।

सभी प्राचीन संस्कृतियाँ ऐसे लोगों का सम्मान करती थीं। कहा जाता था कि ऐसे लोगों के पास दैविक शक्तियाँ होती हैं। अधिकतर संस्कृतियों में जो सबसे पहले भगवान थे वे इन्हीं स्त्री और पुरुष उर्जा के मिले जुले रूप थे। इनका मानना था कि शुरू-शुरू में केवल एक ही भगवान थे जिनके अंदर स्त्री और पुरुष दोनों ही उर्जा थीं। इन्हीं उर्जाओं से उन्होंने दूसरे देवताओं और इस ब्रह्मांड का सृजन किया।

प्राचीन समाजों में ऐसे पुरुषों को समाज में खासा उंचा स्थान दिया जाता था -- अक्सर वे पुजारी, ओझा, ज्योतिषी आदि के रूप में कार्य करते थे। उनकी बातों का बहुत मूल्य होता था। एक तरह से वे ही इस समाज को चलाते थे। यह भी माना जाता था कि उनके अंदर बीमारियों को ठीक करने की दैवकि शक्ति होती है। और वे स्त्रियों और पुरुषों के बीच -- जो कि अलग-अलग जीवन जीते थे एक महत्वपूर्ण कड़ी होते थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि किसी परिवार में ऐसे व्यक्ति का होना ऐसे परिवार के लिये बहुत गर्व की बात होती थी जिससे कि उस परिवार का समाज में ओहदा कई गुना बढ़ जाता था। अमेरिकन इंडियन कबीलों में इन्हें द्वि-उर्जीय व्यक्ति कहा जाता था।

हमारे समाज की जैसे उत्पति हुई इसने पुरुषों में स्त्रीत्व की भावना को दबाने का प्रयत्न किया और जो व्यक्ति पहले द्वि - उर्जीय मान कर पूजे जाते थे उनको अगली कई सदियों तक प्रताड़ित किया गया। उन्हें विकृत और बीमार 'तृतीय लिंग' बताया गया और यहाँ तक कि इसाई समाज में कइयों को सूली पर चढ़ा कर जलाया भी गया। यह सब उसी सामाजिक तंत्र के अंर्तगत हुआ जो कि पुरुषों को किसी भी कीमत पर प्रजनन क्रिया में बाँधना चाहती थी। पर यह दूसरी ही कहानी है।

सदियों के उत्पीड़न के बाद ये प्राचीन द्वि-उर्जीय लोग अब समाज के लिये बेकार हो गये हैं। आज के पाश्चात्य समाज में जहाँ स्त्री और पुरुष साथ रहते हैं और उनके बीच के प्राकृतिक अंतर भी दबाये जा रहे हैं वहाँ तो ऐसे लोगों का मूल्य बिल्कुल ही खत्म हो गया है। अब ये पहले के द्वि-उर्जीय लोग जो पहले पुरुष और स्त्री दोनो थे, अब ना हीं पुरुष रह गये और ना हीं स्त्री। आज उनको गाली दी जाती है, शोषित किया जाता है और उन्हें समाज से बाहर निकाल दिया जाता है। उनकी अनोखी शक्ति अब एक भयानक रूप से नकारात्मक और अपने आप को ही ध्वंस करने वाली हो गई है। हमारे समाज में ऐसे लोगों को हिजड़ा कहा जाता है।

कुछ पचास वर्ष पहले तक हमारे समाज में इन हिजड़ों का फिर भी कुछ सम्मान था। वे समाज में एक अलग वर्ग की भांति रहते थे पर समाज से बाहर नहीं निकाले गये थे। लोग उनको शादी-ब्याह, बच्चे आदि शुभ अवसरों पर स्वयँही बुलाते थे। उनका आर्शीवाद बहुत ही शुभ माना जाता था और उनकी बद्दुआ से लोग बहुत डरते थे। वे खुल कर पुरुषों से प्रेम संबंध स्थापित कर सकते थे और कुछ लोग तो उनसे शादी कर के रहते थे। जो द्वि-उर्जीय लोग स्त्रियों से संबंध बनाते थे वे खुल कर बाहर नहीं आते थे। अंग्रेजों के आने से पहले तो इन लोगों की समाज में स्थिति और भी अच्छी थी।

जेसे-जैसे हम पाश्चात्य होते गये, हमारे दिलों में भी इन लोगों के लिये इज्जत कम होती गयी और आज शायद हममें से बहुत इनसे घृणा करते हैं। आज ये लोग समाज से एकदम ही बाहर निकाल दिये गये हैं।

इन सब बातों ने पुरुषों के जीवन को और वे कैसे सोचते हैं, महसूस करते हैं या व्यवहार करते हैं -- इन सब पर गहरा असर डाला है। पुरुष अब अपने अंदर और दूसरे पुरुषों के अंदर स्त्रीत्व के गुणों से घृणा करने लगे हैं और इससे डरते भी हैं। समाज ने पुरुषों के इसी घृणा और डर का फायदा उठाया है और व्यवहारों को झूठ-मूठ ही मर्दाना या जनाना करार कर के पुरुषों को शोषित करना शुरू कर दिया है।

हमारा समाज हिजड़ों का हाल दिखा कर पुरुषों को धमकाता है कि अगर उन्होंने सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाओं के आगे घुटने नहीं टेके तो उनका भी वही हर्ष होगा जो कि हिजड़ों का हुआ है। और पुरुष ऐसे अंजाम की कल्पना से ही सिहर उठते हैं। उनके दिलों में हिजड़ा नाम से ही नफरत पैदा कर दी गई है। वे चुपचाप कोई सवाल किये सामाजिक मर्दानगी की बेड़ियाँ पहन लेते हैं। वे अपने अंदर के हिजड़े से भी डरते हैं।

और इसे के साथ ही पुरुषों ने अपनी प्राकृतिक ताकत का एक महत्वपूर्ण श्रोत खो दिया है।

पुरुष अपने आप को इस सामाजिक उत्पीड़न से कभी भी मुक्त नहीं करा पायेंगे जब तक कि वे अपने अंदर से नामर्दी के इस डर को निकाल नहीं फेंकते। केवल अपने और दूसरों के अंदर के स्त्रीत्व को आदर के साथ स्वीकार करने से और द्वि-उर्जीय लोगों का सम्मान कर के ही वे एक पूर्ण पुरुष बन सकते हैं।

जय सरस्वती मां

 

स्त्रियों के अधिकारों का सम्मान करना

पुरुष, स्त्री और द्वि-उर्जीय व्यक्ति एक ही सामाजिक तंत्र के उत्पीड़न के शिकार हैं। इसी तंत्र् ने उन दोनों के लिये कड़ी सामाजिक भूमिकाऐं बनाई हैं जो कि दोनों के लिये ही हानिकारक हैं।

पुरुषों को प्रजनन प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा शामिल करने के लिये समाज ने उन्हें स्त्रियों के उपर बहुत सी सामाजिक ताकतें दी हैं, जिससे स्त्रियाँ कई सदियों तक शोषित की जाती रही हैं। जहाँ पुरुषों का दमन अदृश्य और मौन था वहीं स्त्रियों का दमन प्रत्यक्ष रूप से होता रहा है। सदियों तक उन्हें घर की चार दीवारी में बंद कर के रखा जाता रहा। उनकी कीमत बस यही थी कि वह बच्चा जन सकती थीं। सदियों तक वे पुरुषों की 'जायदाद' बनी रही हैं। खासतौर मध्ययुग में स्त्रियों के उपर कई अन्याय हुये हैं।

चाहे प्रजनन करना और बच्चों को पालना स्त्रियों की प्रमुख प्रवति है, पर वे भी बाहर निकल कर इस संसार को अपनी नजरों से देखना चाहती हैं। उनमें भी बहुत सी प्रतिभाऐं और गुण हैं जिन्हें वे विकसित करना चाहती हैं। वे समझदार लोग हैं और अपने निर्णय स्वंय लेना चाहती हैं। शादी और बच्चे पैदा करने के निर्णय भी।

क्योंकि उनका शोषण खुले आम होता रहा था इसका एक फायदा हुआ है कि समाज ने पिछले कई दशकों से इस शोषण को  मान्यता दी है और इसे ठीक करने के भरसक प्रयत्न किये हैं। पर पुरुषों के नजरिये स्त्रियों के अधिकारों के प्रति नहीं बदले हैं। इसकी वजह से स्त्रियों के अधिकार दिलाने में बहुत सफलता नहीं मलि पाई है।

पुरुषों की रुचि स्त्रियों के अधिकारों के प्रति ना होने के दो वजहें हैं। एक तो जब उन्हें सामाजिक भूमिकाओं ने अपनी ही भावनाओं और जरूरतों के प्रति असंवेदनशील बना दिया है तो वे औरों के प्रति क्या संवेदनशील होंगे।

दूसरी वजह यह है कि पुरुषों को स्त्रियों के उपर जो अधिकार जबरदस्ती दिये गये हैं उसकी उनसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। एक तो स्त्रियों को भी पुरुषों के उपर अदृश्य पर असीम ताकत दी गई है जिससे उनका भी भरपूर शोषण हुआ है, जिसे मान्यता तक नहीं मिली है। अब समाज उनसे स्त्रियों के उपर अधिकार तो छीनना चाहता है पर वह पुरुषों के अधिकारों का और हनन कर रहा है और स्त्रियों को दी गयी अदृश्य ताकत भी और बढ़ा रहा है। वह अदृश्य ताकत अब खुले रूप में दी जा रही है। इससे पुरुष वर्ग दोनों तरफ से पिस रहा है और वह बदलाव का विरोध कर रहा है। समानता तभी आ सकती है जब इस अन्यायपूर्ण सामाजिक तंत्र को ही नष्ट कर दिया जाये तो।

कुछ लोग यह समझते हैं कि अगर स्त्रियाँ पुरुष के समान बन जायें तो समानता आ सकती है। इसी धारणा के अंर्तगत स्त्रियों पर पुरुषों की भांति होने का जोर डाला जा रहा है। उनसे पुरुषों के सारे काम और पुरुषों जैसा ही व्यवहार करने की अपेक्षा की जा रही है।

पर पुरुष और स्त्री एक नहीं हैं। प्रकृति ने उन्हें अलग-अलग काबलियतें और लक्ष्य दिये हैं। कुछ स्त्रियाँ भी द्वि-उर्जीय होती हैं पर फिर भी उनकी क्षमताऐं पुरुषों से अलग हैं।

समाज को ऐसा होना चाहिये कि वे हर व्यक्ति को उसके अंर्तमन और सक्षमताओं के अनुरूप जीने का मौका दे। जरूरत यह है कि स्त्री और पुरुष के बीच आपसी समझ और आदर हो।

सबसे अच्छी सामाजिक व्यवस्था वह होगी जहाँ पुरुषों के निर्णय पुरुष वर्ग मिलकर स्वयँ ले और स्त्रियों के निर्णय स्त्री वर्ग ले। ऐसे में द्वि-उर्जीय व्यक्ति दोनों वर्गों में सामंजस्य बैठाने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। प्रकृति ने ऐसे ही तो मानव संसार का सृजन किया था।

 

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