अब हम जानते हैं कि लडके अनेकों प्रकार के समाज द्वारा रचित हथकंडों से गुजरते हैं जिससे उनकी सोच, भावनाऐं व उनके व्यवहार में उनके प्राकृतिक स्वभाव से बहुत फर्क आ जाता है। और इससे उनको बहुत नुकसान होता है। हम यह भी जानते हैं कि यह प्रक्रिया जीवन के पहले चरण से ही शुरू हो जाती है -- जैसे ही बच्चा होश संभालता है। जो लडके इस किताब को पढ़ रहे हैं वे संभवतः अब तक इस आधी से ज़्यादा प्रक्रिया से तो गुजर ही चुके होंगे और फलस्वरूप उनकी प्राकृतिक मर्दानगी का एक बहुत बडा भाग तो उनसे खो चुका होगा। पर इसे वापिस लेने की प्रक्रिया हम अभी भी शुरू कर सकते हैं। खासतौर पर इस उम्र में चीजों का सुधारना आसान होता है। हम आपको निम्नलिखित चरण सुझाते हैं अपनी खोई हुई मर्दानगी को फिर पाने का, और फिर इसको विकसित कर के इसका आनंद उठाने का -- व इसका प्रयोग अपने व समाज के हित के लिये करने का। अपनी प्राकृतिक मर्दानगी को वापिस हासिल करने के चरण: अपनी भावनाओं से जुडना अपनी कमियों और कमजोरियों को स्वीकारना व दूसरों से बांटना एक सुरक्षित वातावरण तैयार करना अपनी अंदरूनी शक्ति का विकास करना अपने अहम् पर विजय पाना झूठी सामाजिक मर्दानगी व ताकत का परित्याग करना दूसरे लडकों से जुडना अपने अंदरूनी जख्मों को भरना अपने सकारात्मक मर्दानगी के गुणों को विकसित करना अपनी शारीरिक मर्दानगी विकसित करना प्रकृति से जुडना
1 अपनी भावनाओं से जुडना: लडके महसूस करना भूल चुके हैं। उन्हें बचपन से ही हम यह देख चुके हैं कि कैसे यह उन्हें अपने ही अंदरूनी जरूरतों, इच्छाओं और जख्मों से काट देती है और इसके कितने नकारात्मक परिणाम होते हैं। यह तो तय है कि हमें अपनी प्राकृतिक मर्दानगी, जो कि हमारे ही भीतर गहरी कहीं दफ्न है, पाने के लिये अपनी भावनाओं को पहचानना सीखना होगा। पर इसे सीखने के लिये हमें थोडा अभ्यास करना पडेगा, जो कि शुरू-शुरू में थोडा मुश्किल लग सकता है। हमें सचेत होकर अपनी भावनाओं को समझना और उन्हें ऐसे व्यक्त करना सीखना होगा कि हमें हानि ना हो। कभी भी अपनी भावनाओं से भागो नहीं और ना हीं उन्हें दबाओ -- चाहे आपको उनसे कितना भी डर क्यों ना लगे। अगर डर लगता है तो उस डर का सामना करो। इसे समझो। यह जरूरी नहीं है कि आप सबसे उन भावनाओं को व्यक्त करो। पर कम से कम आप स्वयं तो उन भावनाओं को महसूस कर के उन्हें अपना सकते हैं। और फिर आप फैसला कर सकते हैं कि उन भावनाओं को व्यक्त किस तरह करना है और किस से करना है। इससे इन भावनाओं को दबाने का तनाव काफी हद तक कम हो सकता है। अगर आप किसी और से उन्हें ना व्यक्त करना चाहें तो फिर भी अकेले में तो उन भावनाओं को किसी ना किसी तरीके से व्यक्त कर ही सकते हैं। अपनी भावनाओं को समझने और अपनाने से आप अपने आप को बेहतर समझ पायेंगे और अपने असली रूप को स्वीकार भी कर पायेंगे। इससे एक अनोखी शांति मिलती है जिसे व्यक्त करना मुमकिन नहीं है। साथ ही आप सामाजिक रूप से भी सुरक्षित रहते हैं। 2 अपनी कमियों और कमजोरियों को स्वीकारना व दूसरों से बांटना: हम सभी इंसान हैं। इस विश्व के सबसे ताकतवर पुरुष में भी कमियाँ और कमजोरियाँ हैं। इन कमियों या कमजोरियों से हम कम मर्द नहीं हो जाते। हम जिन्हें अपनी कमजोरियाँ या कमियाँ समझते हैं इनमें से अधिकतर हमारी कमजोरियाँ नहीं बल्कि हमारी असली ताकत हैं। वह तो इन झूठी मर्दानगी की भूमिकाओं ने हमें बेवकूफ बना कर इन्हें हमारी कमजोरियों के रूप में पेश किया है। बिना इन्हें अपनाए हम अपनी असली मर्दानगी को कभी नहीं पा सकते। और जो सचमुच हमारी कमियाँ और कमजोरियाँ हैं उन्हें अपनाना भी हमारे ही हित में है क्योंकि इन्हें स्वीकार ना करके हम एक भुलावे वाली दुनिया में रहते हैं। जब हम इनका सामना कर के इन्हें स्वीकार कर लेंगे तभी हम इन्हें दूर करने या कम करने के लिये कदम उठा सकते हैं। और हम जो भी फैसले लेंगे इन कमियों को ध्यान में रखते हुये लेंगे। अतः यह हमें ज़्यादा व्यावहारिक बनने में मदद करता है। साथ ही आपके जीवन की पेचीदा समस्याओं से निपटना बहुत ही सरल हो सकता है अगर आप जानकार व्यक्ति से बात कर के मदद ले पायें तो। इसका मतलब यह भी है कि आप अपने अंदर छिपे स्त्रीत्व और नामर्दी कहे जाने वाली सभी चीजों को अपनाऐं। 3 एक सुरक्षित वातावरण तैयार करना: आप ऊपर लिखी चीजें तब तक नहीं कर पायेंगे जब तक आप उस क्रूर सामाजिक मर्दानगी की दौड में जी रहे हों। क्योंकि आपकी जरा सी कमजोरी जाहिर होते ही आपका अपना दोस्त भी इसका उपयोग कर आप को रौंद कर आपसे आगे निकल जाने की कोशिश करेगा। इसी तरह जब तक आप के आस पास ऐसे व्यक्ति हों जो आपके भूमिकाओं को तोडते ही आपको नीचा दिखाने को तैयार हों तो भी आपके लिये इन भूमिकाओं से लड पाना मुश्किल होगा। तो इस समस्या से निपटने के लिये आपको इस दुश्मन दुनिया में अपनी ही एक सुरक्षित जगह बनानी होगी। जहां आप ऐसे कुछ लोगों को -- खासतौर पर पुरुषों को ढूंढ़ पायें जिनके साथ आप जैसे हैं वैसे ही रह पायें। ऐसे लोग आपके दोस्त, भाई-बहन, माता पिता कोई भी हो सकता है बर्शते वह आपके अंर्तमन को समझता हो व आपको आपकी कमियों के बावजूद प्यार करता हो। इस सुरक्षित दायरे को बांटने के लिये सबसे बेहतर व्यक्ति तो एक घनिष्ठ पुरुष दोस्त ही होगा। पर ऐसे संबंधों को बडी ही सावधानी से सींचना पडता है। आपको दूसरों की जरूरतों के प्रति भी संवेदनशील रहने की जरूरत है। उन्हें समझने की जरूरत है। उनकी कमियों के बावजूद उन्हें प्यार करने की जरूरत है। और उन्हें भी आपके समक्ष खुलने का मौका देने की जरूरत है। अगर आप को कोई ऐसा दोस्त मिल जाये तो उसे कभी जाने मत दीजिये। क्योंकि यह वह अनमोल मोती है जो बहुत ही मुश्किल से मिलता है। अपनी दोस्ती के बीच कभी भी झूठे अहम को मत आने दीजिये। और साथ ही इस दायरे में मौजूद दूसरे व्यक्तियों पर झूठी मर्दानगी के दबाव मत डालिये। 4 अपनी अंदरूनी शक्ति का विकास करना क्योंकि पुरुषों में बाहरी सामाजिक ताकत की -- जिसमें पैसा, रुतबा, लडकियाँ आदि शामिल हैं बहुत कद्र होती है, इसीलिये पुरुष सारी उम्र इन्हें पाने के एक्कर में गंवा देते हैं। पर इस सब दौड-भाग में वह अपनी अंदरूनी ताकत को विकसित करना भूल जाते हैं। क्योंकि इसकी कोई सामाजिक हैसियत नहीं है। पर इसके ना होने पर पुरुष अंदर से खोखले रह जाते हैं। अंदरूनी ताकत आदमी की सच्ची खुशी और स्वास्थय के लिये बहुत जरूरी है। इसे विकसित करने के लिये समय निकालिये। अपने गुणों को विकसित कीजिये -- अगर इससे आपके कैरियर या रुतबे में इजाफा नहीं होता तो भी। अपने उन अंदरूनी जरूरतों को जो सामाजिक मर्दानगी की भूमिकाओं से मेल नहीं खाती, दबाइये मत। उन्हें स्वीकार कीजिये और उन्हें परी करने में स्वयं की मदद कीजिये। क्योंकि यही आपकी असली ताकत व मर्दानगी का श्रोत हैं। बाहरी ताकत तो आनी-जानी है पर अंदरूनी ताकत एक बार विकसित हो जाये तो उसे आप से कोई नहीं छीन सकता। समाज भी नहीं। फिर आप सचमुच अजेय हो जाते हैं। याद रखिये जो अंदर है वही असली है, यह सामाजिक ताकत तो केवल एक दिखावा है। 5 अपने अहम को खत्म करना आपका झूठा अहम आपको अपनी सच्ची मर्दानगी तक पहुँचने से रोकेगा। यह आपको झूठी मर्दानगी का सामना करने में भी कमजोर बनायेगा। क्योंकि यह झूठा अहम इन्हीं मर्दानगी की भूमिकाओं ने बनाया है ताकि इसके टूटने के डर से आप इन भूमिकाओं के गुलाम बने रहें। अहम तोडने का मतलब आत्म-सम्मान और खुद्दारी तोडना नहीं है। जहां अहम झूठी मर्दानगी का प्रतीक है वहीं आत्म-सम्मान और खुद्दारी सच्चे मर्दों की निशानी है। अपने अहम के कारण लड़के गलती होने पर भी माफ़ी नहीं मांग सकते उनके लिये सौरी कहना बहुत ही मुश्किल होता है। 6 अपनी झूठी सामाजिक ताकत का त्याग करना अहम से मुक्त् होने के साथ-साथ ही आपको एक और कठिन कार्य करना होगा। झूठी सामाजिक ताकत का परित्याग करना होगा। झूठी ताकत का मोह छोडना होगा। कमजोर व्यक्तियों के लिये यह मुश्किल है। क्योंकि यह झूठी सामाजिक ताकत पाना तो बहुत ही आसान है। और इसमें इतना नशा है। पर सच्ची मर्दानगी पाने के लिये तो पहाड खोदने पडते हैं। पर अगर आप इसे कर सकते हैं तो ही आप अपनी अंदर की मर्दानगी तक पहुँच सकते हैं। इसका मतलब हुआ, उदाहरण के लिये कि आप अगली बार ताकत पाने के लिये लडकियों का प्रयोग नहीं करेंगे। या मर्दाना नजर आने के लिये सिगरेट नहीं पियेंगे। और ऐसी ही बहुत सी चीजें। इसका मतलब यह भी हुआ कि आप झूठी मर्दानगी की दौड में हिस्सा लेना छोड देंगे। और दूसरों पर सामाजिक मर्दानगी का दबाव नहीं डालेंगे। यह सब करने के बाद आप पायेंगे कि आप के पास एक अद्भुत ताकत आयेगी जो आपने कभी भी महसूस नहीं की थी। अब आप अपने असली मर्दानगी तक पहुँचने के लिये तैयार हैं। 7 दूसरे लडकों से जुडना: लडकों की एक बुनियादी जरूरत है दूसरे लडकों के साथ केवल-पुरुषों वाले समूहों में बडा होना। उनकी सकारात्मक मर्दानगी को विकसित करने का सिर्फ़ यही तरीका है। उसे दूसरे लडकों से संबंध स्थापित करना सीखने की जरूरत है -- बिना लडकियों को 'डेट' करने के दबाव के। लडकियाँ लडकों को मर्दानगी के बारे में कुछ नहीं सिखा सकतीं। और जब लडके बडी उम्र के हो जायेंगे तो वे चाह कर भी इसे नहीं विकसित कर पायेंगे। पर जब वे बडे हो जायें तो वे अपनी पसंद की सही लडकी चुन कर शादी जरूर कर सकते हैं। आपको दूसरे लडकों से ऐसी दोस्ती कायम करने की जरूरत है जहां झूठी मर्दानगी की दौड की बजाय अपनापन और एक दूसरे को सहारा देने का जजबा हो। खासतौर पर एक दोस्त ऐसा होना चाहिये जो बहुत ही घनिष्ठ हो। जिसके साथ आप खुलकर एक दूसरे से अपनी भावनाऐं व्यक्त कर पायें। ऐसी दोस्ती जहां एक दूसरे के अंदरूनी जरूरतों और भयों की कद्र हो। जो एक दूसरे की असली और सकारात्मक मर्दानगी निखार पाये। और सारी उम्र आपका साथ दे, हर हाल में। यह हर लडके के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जिसे उससे नहीं छीनना चाहिये। युवा पुरुषों को भी इसी तरह मर्दाने साथ विकसित करने की जरूरत है। अपनी मर्दानगी का जश्न मनाने की जरूरत है। क्योंकि यह मौका फिर नहीं मिलता। युवावस्था का पहला अर्धभाग उसे शादी और बच्चों में बांधने के लिये नहीं होता। ना हीं उसे 'डेटिंग' और स्त्रियों से संबंधों की जद्दो-जहद में डालने का। वे इससे एक महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका अदा कर सकते हैं। और वह है किशोरों की मर्दानगी को विकसित कर उसे सही दिशा में ले जाने का। क्योंकि इस काम के लिये समाज में किसी और के पास ना तो समय है और ना ही रुझान। इसके अभाव में किशोरों की मर्दानी उर्ज़ा गलत रास्तों पर चली जाती है और वे खुद को व समाज को नुकसान पहुँचाते हैं। किशोर हाथियों के ऊपर किये गये शोध से यह साफ हो गया कि अगर उनकी मर्दानी उर्ज़ा को उनसे बडा कोई हाथी सही दिशा नहीं दिखाता तो वह विनाश ला सकती है। 8 अपने अंदरूनी जख्मों को भरना 9 अपने सकारात्मक मर्दानगी के गुणों को विकसित करना 10 अपनी शारीरिक मर्दानगी विकसित करना: आपके व्यक्तित्व व मर्दानगी के पूर्ण विकास के लिये यह अति उत्तम होगा कि आप अपने शारीरिक मर्दानगी का विकास करें। इसके लिये आप युद्ध कलाओं (मार्शल आर्टस), कुश्ती, जिमनास्टिक या एथलैटिक्स आदि में भाग ले सकते हैं। इसके अलावा आप दूसरे लडकों के साथ ट्रेकिंग या राफ्टिंग जैसी शारीरिक गतिविधियों में भी भाग ले सकते हैं। इससे आप की पौरुषत्व की उर्ज़ा का विकास होगा, आपकी शारीरिक क्षमताओं का विकास होगा व आपका मनोबल भी बढ़ेगा। आज का समाज किताबी पढ़ाई पर बहुत जोर देता है पर इन सब चीजों को नजर अंदाज कर देता है। पर आप इन्हें महत्व व अपना समय दे सकते हैं। सबसे उत्तम तो यह होगा कि आप किसी प्राचीन मर्दानी परम्परा से जुड जायें, जैसे कलपिêम, छाउ नृत्य, अखाडा, आदि। इनमें मर्दानगी से जुडी प्राचीन परम्पराऐं अभी भी जिंदा हैं जो आज के समाज में आप को कहीं नहीं मिलेगी। ये परम्पराऐं आप के शारीरिक क्षमताओं के विकास के साथ-साथ आप के मानसिक मर्दानगी का भी विकास करती हैं। वहीं आज के जमाने के पुरुषों के वर्जिश उन्हें केवल देखने में ज़्यादा सुडौल बनाते हैं पर वे अंदर से उतने ताकतवर नहीं होते -- ना हीं शारीरिक तौर से और ना हीं मानसिक तौर पर। 11 प्रकृति से जुडना: जब पुरुष अपनी अंदर की प्राकृतिक मर्दानगी से जुडता है तो उसके अंदर बाहर की प्रकृति के लिये भी असीम प्रेम व आदर विकसित होता है। यही तो इंसान की प्राकृतिक स्थिति है। अंदर की प्रकृति (मर्दानगी) और बाहर की प्रकृति के बीच एक गहरा तालमेल होता है। आधुनिक पुरुष अपने प्राकृतिक वातावरण को खराब इसीलिये कर रहा है क्योंकि जब सदियों पहले उसे अपनी प्राकृतिक मर्दानगी से दूर कर दिया गया था तो उसमें बाहर की प्रकृति की समझ और आदर भी खत्म हो गया। इसी वजह से वह प्रकृति का सर्वनाश करने को विकास का नाम दे रहा है। बाहर की प्रकृति से जुडने के लिये आप अनेकों कार्य कर सकते हैं। प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करें। पानी, बिजली, गैस आदि व्यर्थ ना करें। स्कूटर और कार का प्रयोग कम से कम करें और सार्वजिनक वाहनों का ज़्यादा से ज़्यादा प्रयोग करें। पेडों की रक्षा करें। पेड-पौधे लगायें। पशुओं की सेवा करें, आदि। |